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सोमवार, फ़रवरी 29

जहाँ नाचने को जग सारा

जहाँ नाचने को जग सारा


जीवन एक ऊर्जा अनुपम
पल-पल नूतन होती जाती,
नव छंद, नव ताल सीख लें
 नव सुर में नवगीत सुनाती !

इस पल देखो नभ कुछ कहता
झुकी हुई वसुधा सुनती है !
पवन ओढ़नी ओढ़ी अद्भुत
जल धारा कल-कल बहती है !

मन मयूर क्यों गुपचुप बैठा
जहाँ नाचने को जग सारा,
अल्प क्षुधा ही देह की लेकिन
फैलाया है खूब पसारा !

मुक्त हुआ हंसा भी विचरे
झूठी हैं सारी जंजीरें,
स्वयं पर ही स्वयं टिका यहाँ  
जब जाना बजते मंजीरे !