पग-पग पर बलिहारी अंतर
कण-कण में छवि सरस समायी,
जाने कब तू उतरा नभ से
कैसे पावन धरा बनायी !
पाहन, धूलि, पठार जहाँ तक
निहारती हैं निगाहें दृश्य,
पादप, पेड़, नदी, निर्झर में
अन्तर्हित वह अनाम अदृश्य !
मीन, कीट, सरिसर्प अनोखे
खग, मृग, हरि, शावक, सिंहनियाँ,
भाँति-भाँति के कुसुम खिले हैं
तितली, अलि, अलिंद, मधुकरियाँ !
किंतु न जब तक आया मानव
सृष्टि अधूरी सी लगती थी,
दिव्य चेतना रही तिरोहित
मन, मेधा उसमें जगती थी !
मन से जन्म हुआ मानव का
श्रेष्ठ बुद्धि का है अधिकारी
किंतु डुबाता अहंकार जब
मानस रहा नहीं अविकारी !
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