नभ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नभ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, नवंबर 15

किंतु न जब तक आया मानव

 किंतु न जब तक आया मानव 

पग-पग पर बलिहारी अंतर 

कण-कण में छवि सरस समायी, 

जाने कब तू उतरा नभ से 

कैसे पावन धरा बनायी !


पाहन, धूलि, पठार जहाँ तक 

 निहारती हैं निगाहें दृश्य, 

पादप, पेड़, नदी, निर्झर में 

अन्तर्हित वह अनाम अदृश्य ! 


मीन, कीट, सरिसर्प अनोखे 

खग, मृग, हरि, शावक, सिंहनियाँ,  

भाँति-भाँति के कुसुम खिले हैं 

तितली, अलि, अलिंद, मधुकरियाँ !


किंतु न जब तक आया मानव 

सृष्टि अधूरी सी लगती थी, 

दिव्य चेतना रही तिरोहित 

मन, मेधा उसमें जगती थी !


मन से जन्म हुआ मानव का 

श्रेष्ठ बुद्धि का है अधिकारी 

किंतु डुबाता अहंकार जब

मानस  रहा नहीं अविकारी !

शनिवार, जुलाई 23

कहीं धूप खिली कहीं छाया

कहीं धूप खिली कहीं छाया  

 

यहाँ कुछ भी तजने योग्य नहीं 

यह जगत उसी की है माया,  

वह सूरज सा नभ में दमके 

कहीं धूप खिली कहीं छाया !


दोनों का कारण एक वही 

उसका कुछ कारण नहीं मिला, 

वह एक स्वयंभू शिव सम है 

उससे ही उर आनंद खिला !


नाता उससे क्षण भर न मिटे 

इक धारा उसकी ओर बहे, 

उससे ही पूरित हो अंतर 

वाणी नयनों से उसे गहे !


उसी मौन से प्रकटी हर ध्वनि

खग, कोकिल कूक पुकार बनी,

सागर में उठी लहर जैसे 

जल धारे ही पल-पल उठती !


जग नाटक है वह देख रहा 

मन भी उसका ही मीत बने, 

कुछ भी न इसे छू पायेगा 

निर्द्वन्द्व ध्यान से भरा  रहे !


गुरुवार, जुलाई 21

अंतर में इक दीप जलाये

अंतर में इक दीप जलाये


खुद का खुद से मिलना कैसा 

कली-पुष्प में खिलने जैसा, 

लहर सिंधु में ज्यों खो जाये 

सुरभि चमन में भरने जैसा !


नभ में कोई खुले झरोखा 

जल का इक सरवर दिख जाये, 

छुपी शिला में मूरत कोई 

मन की आँखों से लख जाये !


ध्वनियों का इक मधुरिम आकर 

निशदिन कोई तान सुनाये, 

अम्बर में अनगिन सूरज हैं 

अंतर में इक दीप जलाये !


पलक झपकते ही जैसे यह 

जग पल में विलीन हो जाता, 

अद्भुत मिलन घटे जब तुझसे 

जगत कहीं नजर नहीं आता !


गुरुवार, अगस्त 26

दूर और पास

 दूर और पास 

दूर से सूरज की आभा में 

 नीला पर्वत लग रहा था मोहक 

और उसके नीचे फैला हरा

मैदान बुला रहा था 

पर तपती दोपहरी में 

चला नहीं जाता पर्वत पर 

और मैदान के कंटक पैरों में चुभते थे 

थोड़ी सी दूरी तो चाहिए न 

आकर्षण बनाये रखने के लिए 

नील नभ पर बादल भले लगते हैं 

पर फट कर आंगन में गिर जाएँ तो दुःख देते हैं 

बच्चा नहीं जानता वह माँ के निकट है 

अलिप्त है सो सुंदर है उनके मध्य बहता प्रेम 

ज्यादा निकटता

कुरूपता को जन्म दे सकती है 

मान लेना ही काफी है 

 ‘वह’ सदा हमारे साथ है 

शायद उससे दूरी ही 

उसके प्रति प्रेम को बनाये रखती है ! 


सोमवार, अप्रैल 5

वर्षा थमी

वर्षा थमी 

पंछी छोड़ नीड़ निज चहकें 
मेह थमा निकले सब घर से, 
सूर्य छिपा जो देख घटाएँ 
चमक रहा पुनः चमचम नभ में !

जगह जगह छोटे चहबच्चे
 फुद्कें पंछी छपकें बच्चे, 
गहराई हरीतिमा भू की
 शीतलतर पवन के झोंके !

पल भर पहले जो था काला 
नभ कैसा नीला हो आया, 
धुला-धुला सब स्वच्छ नहा कर  
कुदरत का मेला हो आया !

 इंद्रधनुष सतरंगी नभ में
 सुंदरता अपूर्व बिखराता,
 दो तत्वों का मेल गगन में 
स्वप्निल इक रचना रच जाता !

जहाँ-जहाँ अटकीं जल बूँदें 
 रवि कर से टकराकर चमकें, 
जैसे नभ में टिमटिम तारे 
पत्तों पर जलकण यूँ दमकें !

 कहीं-कहीं कुछ धूसर बादल 
छितरे नभ में होकर निर्बल,
 आयी थी जो सेना डट के
 रिक्त हो गयी बरस बरस के ! 

पूर्ण तामझाम संग आयी 
काले मेघा गज विशाल हो, 
हो गर्जन तर्जन रणभेरी 
चमके विद्युत तिलक भाल ज्यों !

गुरुवार, अगस्त 27

आसमान निर्मल अविकारी

 आसमान निर्मल अविकारी 

 

अंबर, अधर, व्योम,  नीलाम्बर 

गगन, अनंत, अविचल, अकम्पन,

अरबों, खरबों नक्षत्रों  को

निज अवकाश किया है धारण ! 

 

शून्यवत न होता परिभाषित 

धरती को द्यौ व्याप रहा है, 

नित प्रकाश रंगों से सजता  

निज का  कोई रंग नहीं है !

 

एक विशाल चँदोवे जैसा 

तारों से मंडित यह अनुपम, 

एक तत्व है सूक्ष्म अनश्वर 

रचता है जिसे स्वयं ईश्वर !

 

सभी नाद अगास  में होते 

वायु संग आकाश मिले जब, 

भीतर तन के बाहर मन के 

ठहरे इसमें दोनों तन-मन !

 

कभी घने बादल ढक लेते 

जैसे मन को ढके कुहासा, 

आसमान निर्मल अविकारी 

 चमके तड़ित या हो गर्जना !

 


शुक्रवार, जुलाई 17

मिथ्या-अमिथ्या

मिथ्या-अमिथ्या 


बादल ज्यों नभ में आकार लेते हैं 
और पल में बदल जाते हैं 
सागर में लहरें, बूंदें, फेन बनती, बिगड़ती हैं 
गगन पर नक्षत्र  उगते, अस्त होते हैं 
कहीं  कोई स्थिर नहीं... 
देह में कोशिकाएं जन्मती-मरती रहती हैं प्रतिक्षण 
मन एक सरिता की भांति 
बहता जाता है अनंत काल से 
क्रोध, प्रेम, उदारता की लहरें जिसमें 
उमगती मिटती रही हैं हजारों बार 
जो अभी था, अभी नहीं है 
 मिथ्या है
जैसे पर्दे पर कोई तस्वीर हो चलती फिरती 
छुपा है वह प्रोजेक्टर जो पीछे से 
भेज रहा है प्रकाश  
जिससे बनती हैं ये सारी आकृतियां 
उसे खोजें और पल भर के लिए ही कभी 
रिक्त हो जाये पट 
शायद उस क्षण मिलन होगा उससे 
जो मिथ्या नहीं है !


बुधवार, जुलाई 1

सूरज और चाँद

सूरज और चाँद 

‘वह’ सूरज है... 
भरी दोपहरी का 
 तपता  सूरज !
हमें चाँद की शीतल उजास ही सुहाती है  
 मुख फेर लेते हैं हम
उजाले से 
या हमारी आँखें मुंद जाती हैं !

तज प्रखर ज्योति  
 तज विस्तीर्ण गगन  
घूमता रहता मन अपनी ही गलियों में
मद्धिम ज्योत्स्ना 
ही मन को लुभाती है !

वहाँ कोई दूसरा नहीं 
यहाँ पूरा जगत है, 
वहाँ निस्तब्धता है 
यहाँ कोलाहल है !

कोई-कोई ही ‘उसका’
चाहने वाला 
मन का तो हर कोई रखवाला 
‘उसकी’ ही रौशनी प्रतिबिंबित करता  
फिर भी ‘उसके’ निकट जाने से डरता  
सूरज के उगते ही छिप जाता चाँद 
खो जाते  तारिकाओं के समूह 
वह एकक्षत्र स्वामी है नभ का 
नींद में छिप जाता है लेकिन 
 मन स्वप्न तो बुनता ही रहता  
‘उसका’ बल वहाँ नहीं चलता ! 



रविवार, जून 14

तेरा आना

तेरा आना 

तू देता है तो दिए ही चला जाता है 
बह जाते हैं सारे  द्वंद्व जिसमें 
खो जाते हैं भेद सभी 
गिर जाती हैं दीवारें 
तू बरसता है तो बरसे ही चला जाता है 
धुल जाती है धूल मन के दर्पण से 
स्वच्छ हो जाती है दृष्टि 
उग आते हैं कोमल अंकुर 
उगता है केवल देने का भाव 
मिट जाते हैं सारे अभाव 
तेरा आना किसी बदली की तरह नहीं होता 
आच्छादित हो जाता है सारा नभ क्षितिजों तक 
तेरा आना हवा के किसी झोंके की तरह नहीं होता 
छा जाती है मधुऋतु 
तेरा आना किसी महाआकाश के आंगन में उतर जाने सा है 
किसी सागर के दिल में समाने सा है 
तू सुहृद बनकर साथ चलता है 
तेरे साये में ही हर दिल का कमल खिलता है !

सोमवार, अप्रैल 15

सुरमई शाम ढली




सुरमई शाम ढली


खग लौट चले निज नीड़ों को
भरकर विश्वास सुबह होगी !

बरसेगा नभ से उजियारा
फिर गगन परों से तोलेंगे,
गुंजित होगा यह जग सारा
जब नाना स्वर में बोलेंगे !

इक रंगमंच जैसे दुनिया
हर पात्र यहाँ अभिनय करता,
पंछी, पादप, पशु, मानव भी
निज श्रम से रंग भरा करता !

किससे पूछें ? हैं राज कई
कब से ? कहाँ हो पटाक्षेप,
बस तकते रहते आयोजन
विस्मय से आँखें फाड़ देख !

अंतर में जिसने प्रश्न दिए
उत्तर भी शायद वहीं मिलें,
कभी नेत्र मूँद हो स्थिर बैठ
मन के सर्वर में कमल खिलें !

बस खो जाते हैं प्रश्न, नहीं
उत्तर कोई भी मिलता है,
इक मीठा-मीठा स्वाद जहाँ
इक दीप अनोखा जलता है !

बाहर उत्सव भीतर नीरव
कुछ कहना और नहीं कहना,
अंतर से मधुरिम धारा का
 धीमे-धीमे से बस बहना !


सोमवार, जनवरी 29

एक अजाना मौन कहीं है



एक अजाना मौन कहीं है


कभी उत्तंग नभ को छूतीं
कभी क्लांत हो तट पे सोतीं,
सागर को परिभाषित करतीं 
उन लहरों का स्रोत कहीं है !

कभी बुद्ध करुणानिधि बनता
रावण सा भी व्यर्थ गर्जता,
दुनिया जिसके बल पर चलती
उस मानव का अर्थ कहीं है !

अंतर को मधु से भर जाते
जोश बाजुओं में भर जाते,
विमल संग से हृदय पिघलता
उन गीतों का मर्म कहीं है !

भू की गहराई में सोया
नभ की ऊँचाई में खोया,
उर से जिसके शब्द फूटते
एक अजाना मौन कहीं है !

सोमवार, सितंबर 26

कोष भरे अनंत प्रीत के

कोष भरे अनंत प्रीत के

पलकों में जो बंद ख्वाब हैं
पर उनको लग जाने भी दो,
एक हास जो छुपा है भीतर
अधरों पर मुस्काने तो दो !

सारा जगत राह तकता है
तुमसे एक तुम्हीं हो सकते,
होंगे अनगिन तारे नभ पर
चमक नयन में तुम ही भरते !

कोष भरे अनंत प्रीत के
स्रोत छुपाये हो अंतर में,
बह जाने दो उर के मोती
भाव सरि के संग नजर से !

जहाँ पड़ेगी दृष्टि अनुपम
उपवन महकेंगे देवों के,
स्वयं होकर तृप्ति का सागर
कण-कण में निर्झर भावों के !

शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



सोमवार, फ़रवरी 29

जहाँ नाचने को जग सारा

जहाँ नाचने को जग सारा


जीवन एक ऊर्जा अनुपम
पल-पल नूतन होती जाती,
नव छंद, नव ताल सीख लें
 नव सुर में नवगीत सुनाती !

इस पल देखो नभ कुछ कहता
झुकी हुई वसुधा सुनती है !
पवन ओढ़नी ओढ़ी अद्भुत
जल धारा कल-कल बहती है !

मन मयूर क्यों गुपचुप बैठा
जहाँ नाचने को जग सारा,
अल्प क्षुधा ही देह की लेकिन
फैलाया है खूब पसारा !

मुक्त हुआ हंसा भी विचरे
झूठी हैं सारी जंजीरें,
स्वयं पर ही स्वयं टिका यहाँ  
जब जाना बजते मंजीरे !



मंगलवार, अगस्त 18

दिया जो पहले मिला वही

दिया जो पहले मिला वही


जो खाली है वही भरा है
सच ही सच ! न झूठ जरा है,
जो दिखता है.. वही नहीं है
नजर न आता वही वही है !

धरा दौड़ती.. थामे सबको
थिर दिनकर यात्री बनता,
दिया जो पहले मिला वही
मिटा यहाँ जो.. बचा वही !

शब्दों से प्यास नहीं बुझती,
नदिया पर जाना होता है,
पिंजरे से गगन नहीं मिलता
नभ में ही गाना होता है !   

बुधवार, जून 3

नई नकोर कविता


नई नकोर कविता

बरसती नभ से महीन झींसी
छू जाती पल्लवों को आहिस्ता से
ढके जिसे बादलों की ओढ़नी
झरती जा रही फुहार
उस अमल अम्बर से !
छप छप छपाक खेल रहा पाखी जल में
लहराती हवा में लिली और
रजनीगन्धा की शाखें
गुलाब निहारता है जग को भर-भर आँखें
हरी घास पर रंगोली बनाती
 गुलमोहर की पंखुरियां
भीगे-भीगे से इस मौसम में
खो जाता मन 
संग अपने दूर बहा
ले जाती ज्यों पुरवैया...