आदत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
आदत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, मई 17

आदमी


आदमी 

राहबर आये हजारों इस जहाँ में 
आदमी फिर भी भटकता है यहाँ पर !

बेवजह सी बात पर भौहें चढ़ाता  
राह तकता है भला बन शांति की फिर

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर 
किस्से मुक्ति के सुनाता जोश भर कर  

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं से मांगता 
जाने कितने स्वांग भरता भेष धर कर 

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन 
हर युद्ध करता शांति का नाम लेकर  !

उल्टे-सीधे काम भी सभी हो रहे 
है रात-दिन जब मौत का जारी कहर  !
 

रविवार, जून 26

ज्यों की त्यों

ज्यों की त्यों

हर लहर जो सागर से निकलती है
सागर की खबर देती है
हर दुआ जो दिल से निकलती है
दिलबर की खबर ही देगी न ....
और दुआ ही क्यों, हर बददुआ भी
उसके बगैर तो आ नहीं सकती
 यह बात और है कि
हमें आदत है मिलावट की
हर शिशु निर्दोष ही आता है जग में
पर वैसा ही वापस नहीं जाता
कबीर की तरह मन को चादर को
ज्यों की त्यों रखना जो हमें नहीं आता !


शुक्रवार, फ़रवरी 21

आदमी फिर भी भटकता है

आदमी फिर भी भटकता है

राहबर आये हजारों इस जहाँ में
आदमी फिर भी भटकता है !

जरा सी बात पर भौहें चढ़ाता यह
फिर शांति की राह तकता है !

आदतों के जाल में जकड़ा हुआ पर
मुक्तियों के गीत गढ़ता है !

खुद ही गढ़ता बुत उन्हीं ही मांगता
जाने कितने स्वांग भरता है !

इस हिमाकत पर न सदके जाये कौन
शांति के वास्ते युद्ध करता है !

उलटे-सीधे काम भी होते रहेंगे
 रात-दिन जब शंख बजता है !