ठिठक गयी कोयल की कूक
मुरझाई सी आम्र मंजरी
ठिठक गयी कोयल की कूक,
जाने कौन निगोड़ी आकर
गई कान में उसके फूँक !
कैसे घोलें रंग अनूठे
भीगा-भीगा सा मौसम है,
पिचकारी भी सहमी सी है
गुब्बारों पर बैन लगा है !
नफरत के कुछ रंग डालते
कुछ दहशत आतंक बांटते,
कुछ को दौलत रंगी लगती
ताकत, सत्ता, रक्त मांगते !
ऐसे में क्या होगा फाग
लगी हुई है द्वेष की आग,
शायद होली उसे बुझाये
सोये हैं जो जाएँ जाग !
