जमीन से जुड़े लोग
आपके पावों में अभी
चुभा नहीं है कांटा
दर्द आप कैसे जानेंगे
फूंक फूंक कर पीते हैं वे छाछ भी
दूध के जले हैं, इतना तो मानेंगे....
नहीं लगी आग कभी
आलीशान महलों में आपके
फूस की झोंपड़ी थी, जल गयी
बस कहकर यह, लंबी तानेंगे...
पानी बाढ़ का भला, कैसे
करे हिमाकत
चढ़ने की सीढियाँ, महलों की आपके
गाँव के गाँव डूब गए जिसमें
उस सैलाब को
उड़ के आसमां से जानेंगे...
सुलगती रेत में जले नहीं
तलवे जिनके
क्या जानेंगे वे राज माटी का
बरसती आग में न झुलसे तन
बरसते सावन का मजा
खाक जानेंगे...
बारिशें उड़ा ले गयीं न छप्पर जिनका
कैसे भिगोएँगे भला, बादल उनको
उगाते हैं जमीं से जो सोना
पसीने को उन्हीं के, धोयेंगे बादल
कडकती शीत में न कटकटायीं
हाड़ें जिनकी
तपिश अलाव की, न दे पायेगी सुकून
गल न गयीं बर्फ में
उंगलियाँ जिसकी
क्या कदर होगी गर्म वस्त्रों की उसे...
मुश्किलों से जो दो चार हुआ करते हैं
वही श्वासों की कीमत अदा करते हैं
जमीन से जुड़े हैं जो लोग यहाँ
वही जगत की जीनत बना करते हैं !