फूलों, रंगों, झरनों वाले, क्यों भाते हैं गीत
तू बसता है इनमें स्वयं ही, तू जो सबका मीत !
कुहू कुहू कूजन वूजन
सब तुझसे ही घटती है,
एक लोक है इससे सुंदर
सदा वहीं से आती है !
यह हल्की सी छुवन है तेरी
पत्तों की सरसर भी तुझसे,
शरद काल का नीला अम्बर
कहता तेरी गाथा मुझसे !
हरी कोंपलों पर किरणों की
चमक रूप नए
धरती है,
स्वर्णिम तेरा रूप अनोखा
छवि कैसी पुलक भरती है !
केसरिया, श्वेत तन वाले
पारिजात क्यों झर जाते हैं,
तेरे सुरभि कोष से लेकर
कतरे चंद बिखर जाते हैं !
धूप-छाँव का खेल अनोखा
दिवस-रात्रि का मेला अद्भुत,
तूने सहज रचा है प्रियतम
तू ही बदली तू ही विद्युत !
