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शुक्रवार, जुलाई 3

द्रष्टा

द्रष्टा 

कवि द्रष्टा है 
उसने सत्य देखे हैं 
भुला देने दो सारे शास्त्र 
वह स्वयं शास्त्र है 
भुला देने तो सारा अतीत 
वह नया इतिहास रचेगा 
उससे झरते हैं शब्दों के झरने 
जहां से बनती है सृष्टि 
उसने चुना है वह 
जो कोई अन्य नहीं चुनता !
राही है वह अनजान राहों का 
अनसुलझे रहस्यों का 
बिना चढ़े ही नापी हैं उसने हिमालय की चोटियां 
रोया है उसका मन 
उस कृषक के साथ 
सुख गए हैं जिसके खेत 
वह मुस्काया है वर्षा की पहली बून्द पर 
उस तरह जैसे मुस्काये न कोई 
कोहिनूर मिलने पर !


सोमवार, सितंबर 16

विश्वकर्मा पूजा पर ढेरों शुभकामनायें

विश्वकर्मा पूजा पर ढेरों शुभकामनायें 



एक भोर उजास भरी

जिस दिन आएगी भारत में
स्वप्न सृजन का दृग खोलेगा,
कर्मठता का हर अंतर में
एक सघन विश्वास उगेगा !
  
एक ज्योति आह्लाद भरी

जिस पल जन-जन में छाएगी
कृषक सुखद जीवन जीएगा,
नहीं मरेगा श्रमिक भूख से
औजारों में रब दीखेगा !

एक लहर आह्वान भरी

जिस क्षण छाएगी हर ओर
 श्वास-श्वास होगी तब अर्पित,
 गीत रचेगा कण-कण, भूमि
सरसेगी युग-युग से वंचित !

शुक्रवार, जून 29

छू सकते आसमान





छू सकते आसमान 

जो मिला ही हुआ है
नहीं देखते आँख उठाकर भी
उसकी ओर..
बिछड़ने ही वाला है जो
 थामना चाहते हैं उसे
जो है, अस्वीकार करने में उसे
नहीं लगती पल भर की भी देर...
जो हो नहीं सकते
दौड़ लगाते हैं उसकी ओर...

 विद्यार्थी, बना रहे विद्यार्थी यदि
आत्महत्याएँ हों न शिक्षालयों में
पत्नी हो पाए एक पत्नी
 सीख ले पति, पति होना
बच जाएँ कितने घर गृहयुद्धों से
बच्चे निभाने दें
माँ पिता को अपनी भूमिका
तो प्रेम की एक डोर
बांधे रहे उन्हें आजीवन....

अध्यापक तज देता है अध्यापन
करने के लिये व्यापार
दुरूपयोग करे अधिकारी, अधिकार
बेमन से करे कृषि कर्म कृषक
हर इक गाँव बनना चाहता हो शहर..
हिल जायेगी सारी व्यवस्था
एक नन्हा सा पुर्जा भी मशीन का
 हिल जाये जब
दिख ही जाती है उसकी व्यर्थता

हम जो हैं, रखे गए हैं जहाँ
बेशकीमती है वह स्थान
छूया जा सकता है आकाश
उस स्थान से भी...
नाप सकते हैं सागरों की गहराई
उस स्थान से भी....

पूर्ण है हर कर्म
पूर्ण है हर प्राणी
पूर्ण है हर सम्बन्ध
यदि समझ है पूर्ण इंसान की...