जीवन तो है इक क्रीड़ांगन
जीवन जो उपहार मिला था
उसे व्यर्थ ही बोझ बनाया,
घड़ी देखकर जगते-सोते
रिश्तों को भी सोच बनाया !
तन-मन जैसे यंत्र बन गए
अब स्वत:स्फूर्त कहाँ है घटता,
वही सवाल, जवाब भी वही
गुम हो गयी उर की सरसता !
नहीं शेष सुवास साँसों में
जब भी वे लघु होती जातीं,
जितना बड़ा दायरा दिल का
उतना खुद को वे फैलातीं !
गहराई जब मन में होगी
होगी गहरी लंबी सांसें,
भय से भरा हुआ जब अंतर
कंपन से भर जाती सांसें !
नहीं भूमि यह संघर्षों की
जीवन तो है इक क्रीड़ांगन,
छोटे-छोटे अनुभव मिलते
कण-कण में हो पावन दर्शन !
कुदरत का सान्निध्य अनूठा
श्रम के स्वेद बिंदु मस्तक पर,
जीवन एक खेल बन जाता
चाह नहीं जब भारी मन पर !
