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मंगलवार, मई 18

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन

जीवन जो उपहार मिला था 

उसे व्यर्थ ही बोझ बनाया,

घड़ी देखकर जगते-सोते 

रिश्तों को भी सोच बनाया ! 


तन-मन जैसे यंत्र बन गए  

अब स्वत:स्फूर्त कहाँ है घटता,  

वही सवाल, जवाब भी वही 

गुम हो गयी उर की सरसता !


नहीं शेष सुवास साँसों में

जब भी वे लघु होती जातीं, 

जितना बड़ा दायरा दिल का 

उतना खुद को वे फैलातीं !


गहराई जब मन में होगी 

होगी गहरी लंबी सांसें, 

भय से भरा हुआ जब अंतर 

कंपन से भर जाती सांसें !


नहीं भूमि यह संघर्षों  की 

जीवन तो है इक क्रीड़ांगन, 

छोटे-छोटे अनुभव मिलते

कण-कण में हो पावन दर्शन !


कुदरत का सान्निध्य अनूठा 

श्रम के स्वेद बिंदु  मस्तक पर, 

जीवन एक खेल बन जाता 

चाह नहीं जब भारी मन पर !