कैसी थी वह दूरी
तुमसे दूरी क्या हुई
गाज़ हम पे गिर गयी
जाने किस बेसुध क्षण में
आग दिल में लग गयी
वह तो अच्छा हुआ जाना
घर तुम्हारा करीब था
दरवाजा भी खुला था
खुश अपना नसीब था
गर नहाये न होते
तुम्हारी याद की बारिश में
सुलगते
रहते तुम्हारे दर तक
यह भी क्या संयोग था
भूले थे छाता घर पर