मौसम का उल्लास समेटे
घन घन घन घन मेघ गरजते
टिप टिप टिप टिप झरतीं बूँदें,
पारिजात, कंचन, कनेर मिल
भीग रहे सरसाएं झूमें !
गगन सलेटी, पवन नशीली
भीगी गलियाँ, सड़कें काली,
गर्जन तर्जन सुनकर निकले
दादुर, मोर, कोकिला बाली !
छू जाती शीतल फुहार जब
जैसे मादक सुरभि बिखरी,
सिर पर बोझ उठा अचानक
मजदूरिन इक वहाँ से गुजरी !
श्रम सीकर मिलकर बूँदों से
मुखड़ा उसका स्वच्छ कर रहे,
हवा,प्रकाश, धरती, आकाश
आह्लाद अंतर में भर रहे !
कदमों में इक ताल भरी थी
ख़ाली पथ पर दौड़े जाती,
मौसम का उल्लास समेटे
हर अकुलाहट छोड़े जाती !
इक जन छाता लेकर निकला
मानो गल जाएगा जल से,
कोई घर बैठे ही डरता
वर्षा के इस कोलाहल से !
जीवन को पूरा स्वीकारे
कवि का अंतर है आह्लादित,
कुदरत का वह प्रिय सहचर है
मन अंतर सुख से आच्छादित !
