धरती सदा लुटाती वैभव
धरती हर तन को धारे है
वसुधा तप से प्राणी हैं थिर,
पृथ्वी का आकर्षण बाँधे
भूमि में ही मिलेंगे इक दिन !
छिपे धरा में मोती-माणिक
नदियाँ बहतीं हिम शिखरों से,
रुधिर नाड़ियों में संचारित
अनगिन राज छिपे नर तन में !
भू भ्रमण चले अपने धुर पर
परिक्रमा रवि की भी करती,
तन भी मुड़-मुड़ देखे खुद को
प्रदक्षिणा सविता मेधा की !
धरा स्थूलतम टिकी सूक्ष्म पर
देह भी मन के रहे आश्रित,
मन में मृत यदि जीवन आशा
कर देता है इसे विखण्डित !
धरा शुद्ध हो कुसुम खिलाये
शुभ सुंदर लावण्य लुभाये,
नयन हँसे रोम-रोम पुलकित
गालों पर गुलाब खिल जाएँ !
महाभूत यह महादेव का
धरती सदा लुटाती वैभव,
कैसे यह उपकार चुकेगा
सदा बिखेरे करुणा सौरभ !


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