ज्वाला कोई जले निरंतर
बरस रहा है कोई अविरत
झर-झर झर-झर, झर-झर झर-झर
भीग रहा कब कोई पागल
ढूँढे जाता सरवर, पोखर !
प्रीत गगरिया छलक रही है
युगों-युगों से सर-सर सर-सर,
प्यासे कंठ न पीते लेकिन
अकुलाये से खोजें निर्झर !
ज्वाला कोई जले निरंतर
बहे उजाला मद्धिम-मद्धिम,
राह टटोले नहीं मिले पर
अंधकार में टकराते हम !
शब्दों में वह नहीं समाये
अंतर को ही अम्बर कर लें,
कैसे जग को उसे दिखाएँ
रोम-रोम में जिसको भर लें !
गाए रुन-झुन, रिन-झिन, निशदिन
हँसता हिम शिखरों के जैसा,
रत्ती भर भी जगह न छोड़े
बसा पुष्प में सौरभ जैसा !
रग-रग रेशा-रेशा पुलकित
कण-कण गीत उसी के गाये ,
रिसता मधु सागर के जैसा
श्वास-श्वास में वही समाये !
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