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गुरुवार, अगस्त 30

चंदा ज्यों गागर से ढलका



चंदा ज्यों गागर से ढलका

खाली है मन बिल्कुल खाली
एक हाथ से बजती ताली,
चेहरा जन्म पूर्व का जैसे
झलक मृत्यु बाद की जैसे !

ठहरा है मन बिल्कुल ठहरा
मीलों तक ज्यों फैला सेहरा,
हवा भी डरती हो बहने से
श्वासों पर लगा है पहरा !

हल्का है मन बिल्कुल हल्का
नीलगगन ज्यों उसमें झलका,
जो दिखता है किन्तु नहीं है
चंदा ज्यों गागर से ढलका !

है अबूझ सब जान रहा है
कहना मुश्किल, मान रहा है,
पार हुआ जो जिजीविषा से
खेल मृत्यु से ठान रहा है !