चंदा ज्यों गागर से ढलका
खाली है मन बिल्कुल खाली
एक हाथ से बजती ताली,
चेहरा जन्म पूर्व का जैसे
झलक मृत्यु बाद की जैसे !
ठहरा है मन बिल्कुल ठहरा
मीलों तक ज्यों फैला सेहरा,
हवा भी डरती हो बहने से
श्वासों पर लगा है पहरा !
हल्का है मन बिल्कुल हल्का
नीलगगन ज्यों उसमें झलका,
जो दिखता है किन्तु नहीं है
चंदा ज्यों गागर से ढलका !
है अबूझ सब जान रहा है
कहना मुश्किल, मान रहा है,
पार हुआ जो जिजीविषा से
खेल मृत्यु से ठान रहा है !
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