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बुधवार, दिसंबर 27

मन कहाँ ख़ाली हुआ है

मन कहाँ ख़ाली हुआ है 


यह ग़लत है, वह ग़लत है 

ग़लत है सारा जहाँ, 

बस सही हम जा रहे, यह 

राह रोके क्यों खड़ा ?


क्यों नहीं उड़ते गगन में 

देर अब किस बात की, 

थी तैयारी इस पल की 

बात क्या फिर राज की !


ढेर बोझा है दिलों पर 

अनगिनत शिकवे छिपे, 

मन कहाँ ख़ाली हुआ है 

तीर कितने हैं बिंधे !


आग भी जलती, वहीं है  

प्रीत का दरिया छिपा, 

जाग कोई देखता, कब  

तमस में मन आ घिरा !