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मंगलवार, अप्रैल 15

खो गये वे शब्द सारे

खो गये वे शब्द सारे 


खो गये वे शब्द सारे 


नाव हम जिनकी बनाकर 

पहुँच जाते थे किनारे !


अब यहाँ लहरें व हम हैं 

डूबने में कहाँ  ग़म है, 

छू लिया जिसने तली को 

संस्तर हो गये बेगाने !


खो गये वह शब्द सारे 


नीड़ जिनसे हम बनाकर 

श्रम मिटाकर शरण धारे !


अब यहाँ विस्तृत गगन है 

उड़ें जिसमें यह लगन है, 

पा लिया जिसने फ़लक को 

नीड़ हो गये बेगाने !


खो गये वे शब्द सारे 


ढाल जिनकी हम बनाकर 

झेलते थे दंश सारे ! 


अब यहाँ केवल ख़ुशी है 

महकती सी ज़िंदगी है, 

पा लिया है तोष जिसने 

युद्ध हो गये बेगाने !


शुक्रवार, जनवरी 10

तलाश




तलाश 

हर तलाश ख़ुद से दूर लिए जाती है 
जिंदगी हर बार यही तो सिखाती है 

खुदी में डूब कर ही उसको पाया है 
अगर ढूँढा किसी ने सिर्फ़ गँवाया है 

दिल यह छोटा सा भला कब खोज पाएगा
मिलन हुआ भी तो कहाँ उसे बैठायेगा 

हो रही है सारी खोज जल की मरुथल में 
 न बुझेगी प्यास जिगर सूना रह जाएगा 

उठाकर आँख जरा देखो यहीं पाओगे 
वरना यूँही यह दिल तकता रह जाएगा

प्रीत का बीज सोया उसे जगाना है 
खिल उठेगा खुशबुओं से भर जाएगा  

बुधवार, मई 17

किताब ज़िंदगी की

किताब ज़िंदगी की 


मुस्कुराओ कि अभी ज़िंदा हो 

आख़िर किस बात पर शर्मिंदा हो 

हाथ थामा है जब उसने 

आगे बढ़कर, 

परवाज़ लगाओ

 मानो कोई परिंदा हो 

रूह तो क़ैद नहीं, उसकी सुनो 

अमन औ” चैन के नये ख़्वाब बुनो !

ज़िंदगी किताब कोरी सी 

हर रात हो जाती,  

हर सुबह नया इक नाम चुनो !

ओढ़ रखा है क्यों मायूसी का

 लबादा सिर पर 

जब डोर बांधी है जन्नतों से दिल की 

कोई सागर पास ही उफनता है 

नाच सकते हो जिसकी लहरों पर 

चाँद छूने का बस इक इरादा ही काफ़ी  

दिल की गहराइयों से जो निकला हो 

श्वासें न खर्च हों समेटते उदासियों को

जबकि हाथ कोई प्यार से सिर पर रखे  ! 


गुरुवार, जनवरी 19

कुछ छुपाने को न कुछ बताने को


कुछ छुपाने को न कुछ बताने को 


खुली किताब सा जब बन जाता है 

साथ कुदरत का उसे मिल जाता है 

कुछ छुपाने को न कुछ बताने को 

राहे इश्क़ पर दिल निकल जाता है 


दिल के घावों को हवा लगने दो 

धूप में ज़िंदगी की उन्हें तपने दो 

ढाँक रखने से न हल होंगे कभी 

खुल के जियो औरों को जीने दो 


हवा बहती है फूल खिलते हैं 

कुछ ऐसे ही यहाँ लोग मिलते हैं 

दिल भरा हो प्रेम से लबालब 

ठाँव अपनों के कहाँ हिलते हैं 


खुद को देखोगे तो सराहोगे 

दूर दिल से नहीं जा पाओगे 

जहाँ बसता है कोई जादूगर 

सारी दुनिया को वहीं पाओगे 


अपनी नज़रों में खुद को खुद देखो 

यह हक़ीक़त है आज या कल देखो 

खुद को चाहता नहीं जब तक कोई 

इश्क के घर से उसे दूर ही देखो 


 खिला फूल सुबह शाम झर जाता है 

चंद श्वासों का ज़िंदगी से नाता है 

दो घड़ी साथ मिले जिस किसी का यहाँ 

शुक्रिया हर बात पर निकल आता है 




बुधवार, जून 8

छुए जाता है पवन ज्यों

छुए जाता है पवन ज्यों 


ज़िंदगी पल-पल गुजरती 

रूप निज हर क्षण बदलती, 

 जैसे मिले, स्वीकार लें 

देकर प्रथम, अधिकार लें ! 


व्यर्थ ही हम जूझते हैं 

बह चलें सँग धार के यदि, 

ऊष्मा भाव की खिल के 

मुक्त होगी निज व उनकी !


चार दिन का साथ है यह 

क्यों यहाँ ख़ेमे लगाएँ, 

छुए जाता है पवन ज्यों 

इस जहाँ से गुजर जाएँ !


बुधवार, अप्रैल 27

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का



फ़लसफ़ा ज़िंदगी का


कभी सुकून कभी बेताबी बन कर छा गया 

वह क्या था जो अक्सर इस दिल को भरमा गया 


पहरों बैठ कर सुलझाये थे सवाल जिसके 

वह दिलेफूल तो इक पल में ही मुरझा गया 


सही था ग़लत मान बैठे थे जिसको कब से 

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का इक बच्चा समझा गया 


कभी तन्हा तो कभी सजी महफ़िलें संग-संग 

इस उड़नखटोले पर भला कौन बैठा गया 


अंधेरे बढ़ गए दुनिया में यकीं जब हुआ 

कौन चुपचाप आके दिल को फिर सहला गया 


हारा सच जीत झूठ की हुई होगी जग में 

सच का बिरवा ख़ुदा फिर से मन में लगा गया 


गुरुवार, अगस्त 26

एक मंजिल एक रस्ता

एक मंजिल एक रस्ता 

तुम्हीं से  मधुमास मेरा

तुम्हीं से  संसार है

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !


मन अभी खिलने न पाया 

जब नया था यह सफर,

जिस घड़ी यह हाथ  थामा  

चल पड़े हम इस डगर !


सदा तब से इस हृदय को 

प्रेम का आधार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !


जिंदगी में ज्वार-भाटे, 

सरिता सुख-दुःख भरी,

धूप-छांव से हैं रस्ते, 

सूखतीं डालें हरी !


किन्तु रहता एक सा ही

बस तुम्हारा प्यार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा

यह मधुर  श्रृंगार है !


एक मंजिल एक रस्ता 

एक ही अपना चल,

चाँदनी ओढ़ी बदन पर  

संग सूरज की तपन !


पुलकित  हो अधर कंपते, 

नयन में मनुहार है,

तुम न हो तो व्यर्थ सारा, 

यह मधुर  श्रृंगार है !



२६ अगस्त २०१०