खो गये वे शब्द सारे
खो गये वे शब्द सारे
नाव हम जिनकी बनाकर
पहुँच जाते थे किनारे !
अब यहाँ लहरें व हम हैं
डूबने में कहाँ ग़म है,
छू लिया जिसने तली को
संस्तर हो गये बेगाने !
खो गये वह शब्द सारे
नीड़ जिनसे हम बनाकर
श्रम मिटाकर शरण धारे !
अब यहाँ विस्तृत गगन है
उड़ें जिसमें यह लगन है,
पा लिया जिसने फ़लक को
नीड़ हो गये बेगाने !
खो गये वे शब्द सारे
ढाल जिनकी हम बनाकर
झेलते थे दंश सारे !
अब यहाँ केवल ख़ुशी है
महकती सी ज़िंदगी है,
पा लिया है तोष जिसने
युद्ध हो गये बेगाने !


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