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बुधवार, अप्रैल 22

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

मन उपवन निशदिन सजा रहे

नहीं उग पाए खर-पतवार,

मंजिल की बाधा बन जाये 

जमे न ऐसा कोई विचार !

 

आशा के कुछ पुष्प उगायें, 

पोषण दे, ऐसा ही सोचें,

कंटक चुन-चुन बीनें पथ से, 

सदा अशुभ को बाहर रोकें !

 

प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 

दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,

 धार प्रेम की बहती जाये 

मेधा,प्रज्ञा की ज्योति जगे !

 

अपसंस्कृति को प्रश्रय मत  दें 

सुसंस्कृति सदा  फैले-फूले, 

तहस-नहस न कभी हो उपवन 

जीवन सबके निशदिन महकें !

 

नया-नया सा नित विचार हो 

भीतर शुभ ज्ञान  तृषा जागे, 

जिज्ञासा जागृत हो मन में 

मन भय से दूर नहीं भागे !

 

रहे जागरण भीतर प्रतिपल 

प्रतिपल श्रद्धा कर लें अर्जित,

आगे ही आगे बढ़ना है 

भीतर हो अखंड स्मृति वर्धित !


 

शुक्रवार, जून 21

वही चेतना वही बोध है


वही चेतना वही बोध है

चिन्मय बसा रहे मेधा में

योग्य वरण के एक ईश है,

जग यह मोहक रूप धर रहा

सुंदर उससे कौन शीश है !

 

उसे जानना पाना उसको

हो शुभ जीवन का लक्ष्य यही,

जिससे परम प्रपंच घटा है

महिमा सदा अनंत अगम की !

 

वही श्रेष्ठ विभु सुख का सागर

नीर, वायु, पावक का दायक, 

जड़ यह पाँच भूतों की सृष्टि

चेतन वही ज्ञान संवाहक !

 

उस चेतन का ध्यान धरें हम

उसके हित ही उसे भजें हम,

जग ही माँगा यदि उससे भी

व्यर्थ रहेगा यह सारा श्रम !

 

उसके सिवा न कोई दूजा

इन श्वासों का वही प्रदाता,

प्रज्ञामेधाधी उससे है

ज्ञान स्वरूप वही है ज्ञाता !

 

वही चेतना वही बोध है

उसका ही हो मन में चिंतन,

आनंद का स्रोत अजस्र है

स्फुरण सहज वही, वही स्पंदन !

 

अपनी महिमा वह ही जाने

मेधा में मणि जैसा दमके,

यही कामना है अंतर की

अपनी गरिमा में नित चमके !

 

सभी कारणों का वह कारण

खुद रहता है सदा अकारण,

सुंदर दुनिया एक रचायी

निज उजास का करने वितरण !

 

अहंकार कर जिस क्षण भूला

टूट गई वह डोर प्रीत की,

मन विवेक का थामे दामन

दुविधा छूटे हार-जीत की !

 

अविनाशी कण-कण में देखे

शाश्वत हर घटना के पीछे,

हर अंतर में छुपा पुरातन

मौन ध्यान में सहज निहारे ! 


मंगलवार, अगस्त 30

गणेश चतुर्थी

 तेरे गुण अनुपम अनंत हैं

जग करता तेरा आराधन

हे गणपति ! हम तुझे चाहते,

 सबके साधन पूर्ण करे तू 

तुझसे बस हम प्रेम मांगते !


ज्ञानसिंधु तू विघ्न विनाशक

रिद्धि सिद्धि का भी है दाता,

 अव्यक्त, चिन्मया, अविनाशी

बुद्धि, विवेक, बोध प्रदाता !


तू विशाल, निर्भय, गर्वीला

दर्शन तेरा शक्ति जगाता,

तेरे गुण अनुपम अनंत हैं

अंतर में चेतना जगाता  !


बड़ी शान है, बड़ा दबदबा

हर बाधा को सदा रौंदता,

आगे बढ़ने का बल देता

अति दयालु, हर पीड़ा हरता !


कर्ण विशाल सभी की सुनता

नयनों में असीम गहराई,

जो भी झाँकें इन नयनों में

प्रज्ञा उसकी भी जग आई !


छोटे-बड़े सभी हैं तेरे

सदा जागृत सजग प्रहरी सा,

भक्त प्रेम से बंधता तुझसे

दुर्जन को यह पाश बाँधता !


छोटा सा मूषक भी तेरा

मोदक मृदु आनंद सा  रसमय,

तुझे समर्पित है तन-मन-धन

हे अनंत ! जग तुझको ध्याता !


सोमवार, जुलाई 20

जीवन मिला था फूल सा


जीवन मिला था फूल सा 


सुख कामना के पाश में  
जकड़ा रहा दिन-रात मन, 
जो  था सदा जो है  सदा 
होता नहीं उससे मिलन !

जीवन मिला था फूल सा 
फिर शूल बन कर क्यों चुभे, 
प्रज्ञा का दीप जल रहा 
पर रात काली क्यों डसे !

जो जानता है राज यह 
है रिक्त उसका मन हुआ, 
वह शून्यवत आकाश है 
विलीन हर अनुबंध हुआ !

पशु है वही जो पाश में 
जकड़ा हुआ है काम में, 
मानव वही जो झाँक ले 
नयनों में उस अनाम के !

शनिवार, अगस्त 20

मन के रूप हजार


मन के रूप हजार

मन की झील पर
जम जाता है शब्दों का शैवाल  
या ढक लेती है जल को विचारों की पत्तियां
नजर आती नहीं झील की गहराई
तब अचानक प्रज्ञा की आंधी उडा ले जाती है
पत्तों को एक किनारे या बहा देती है काई 
दूर तक और झलक उठती है
चमचमाती तलहटी !

कभी मन की भूमि पर
उग आते हैं शब्दों के जंगल
इतने घने कि पट जाती है भूमि
शुष्क पत्तों से  
प्रकाश की एक किरण नहीं पहुंच पाती
और छा जाता है सीलन भरा अंधकार
तब कोई ज्ञान की कटार से
काट देता है जंगल
उतर आती है धूप और मन खिल उठता है जीवंत !

मन की बगिया में कभी उग आते हैं
शब्दों के खरपतवार या कंटक अनचाहे
नष्ट हो जाती है समता की खेती
विचरते जहां उलझ कर फट जाते हैं
आत्मा के वस्त्र, विवेक रूपी माली आकर
उखाड़ फेंकता है खर पतवार और जला देता है कंटक
पनपते हैं पुष्प शांति, प्रेम और आनंद के...