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शुक्रवार, अगस्त 22

नई मंज़िल का पता पा

नई मंज़िल का पता पा 


दूर हों अज्ञान से हम 

कामनाएँ मिट रहें, 

स्वयं में ही तृप्त हो मन  

 कोई अभाव न खले !


किसी क्षण में वह परम मिल 

उसी पथ पर ले चले, 

दूर होगी हर इक कलल 

संग उसके मन हँसे !


यज्ञ की ज्वाला उठेगी

मिलन का उत्सव मने, 

नई मंज़िल का पता पा  

ज्योति सा मन खिल उठे !



शनिवार, मई 31

कामना का अभाव

कामना का अभाव 


जैसे धुएँ से ढकी रहती है अग्नि 

और धूल से दर्पण 

वैसे ही ढक जाती है चेतना 

कामना के आवरण से 

उजागर नहीं होने देती सत्य 

अनावृत मन ही हो जाता अनंत

हर कामना यदि अर्पित हो जाये 

रिक्त अन्तर में विश्वास यह भर जाये 

 पल-पल कुशल-क्षेम कोई रखे ही जाता 

तो हर बार वार अभाव का ख़ाली चला जाता 

पूर्णता की तलाश हर अभाव को मिटाना है 

मुक्त हो हर प्रभाव से, स्वभाव में आ जाना है ! 


बुधवार, मार्च 23

तेरी निष्ठुर करुणा भी

तेरी निष्ठुर करुणा भी 


कामना की अगन भीषण
जल रहा दिन-रात अंतर,
हृदय अकुलाया भटकता 
शोक से व्याकुल हुआ उर  !

तू दृढ़ अंकुश बन आया 
 ताप से मुझको बचाने, 
तेरी निष्ठुर करुणा भी 
बसी जीवन औ' मरण में !

दिए तन-मन प्राण,वसुधा   
 नील अम्बर बिना माँगे, 
तृप्त उर कुछ भी न चाहे 
मिटे लालसा शुभ जागे  !

कभी थक अलसाए नैन 
कभी अधजगा सा  चलता, 
एक खोज में लगा हुआ  
तेरे पथ  बढ़ता जाता !

लिए ओट तू छिप जाता 
राज यह मैंने जाना , 
पूर्व मिलन से योग्य बनूँ 
मक़सद तेरा पहचाना !


(गीतांजलि से प्रेरित पंक्तियाँ)

सोमवार, जुलाई 20

जीवन मिला था फूल सा


जीवन मिला था फूल सा 


सुख कामना के पाश में  
जकड़ा रहा दिन-रात मन, 
जो  था सदा जो है  सदा 
होता नहीं उससे मिलन !

जीवन मिला था फूल सा 
फिर शूल बन कर क्यों चुभे, 
प्रज्ञा का दीप जल रहा 
पर रात काली क्यों डसे !

जो जानता है राज यह 
है रिक्त उसका मन हुआ, 
वह शून्यवत आकाश है 
विलीन हर अनुबंध हुआ !

पशु है वही जो पाश में 
जकड़ा हुआ है काम में, 
मानव वही जो झाँक ले 
नयनों में उस अनाम के !

गुरुवार, जून 11

श्रद्धा सुमन

श्रद्धा सुमन 

एक ही शक्ति एक ही भक्ति 
एक ही मुक्ति एक ही युक्ति 
एक सिवा नहीं दूजा कोई 
एकै जाने परम सुख होई

तुझ एक से ही सब उपजा है 
यह जानकर हमें पहले तृप्त होना है भीतर 
फिर द्वैत के जगत में आ 
आँख भर जगत को देखना है 
हर घटना के पीछे तू ही है 
हर व्यक्ति के पीछे तेरी अभिव्यक्ति 
हर वस्तु की गहराई में तेरी ही सत्ता है 
यह जानकर झर जाती हैं 
कामनाएं हृदय वृक्ष से 
सूखे पत्तों की तरह 
और फूटने लगती हैं नव कोंपलें 
श्रद्धा का पुष्प खिलता है 
नेह का पराग झरता है 
अनुराग की सुवास उड़ती है 
जो जरूर पहुँचती होगी तुझ तक !

मंगलवार, जून 9

का मना ?

का मना ?

क्या है मन में 
दो ही तो हैं यहाँ
एक ‘मैं’ दूजा ‘तू’
 ‘मैं’ है, तो यही कामना है  
अर्थात बंधन
 यदि ‘तू’ है तो मुक्ति !

‘मैं’  किसी का बचता नहीं 
‘तू’ कभी मिटता नहीं 
‘मैं’ लहर है ‘तू’ सागर है 
‘मैं’ किरण है ‘तू’ दिनकर है 
‘मैं’ युक्त है तुझसे पर जानता नहीं 
‘मैं’ कुछ नहीं ‘तू’ के बिना पर मानता नहीं 
‘मैं’ अँधेरा है ‘तू’ ज्योति है 
‘मैं’ दुई है ‘तू’ एकता है 
‘मैं’ मरे तो ‘तू’ हो जाता है 
‘तू’ रहे तो ‘मैं’ खो जाता है 

दो ही तो हैं वहाँ 
एक माया दूजा हरि 
माया ‘मैं’ को नचाती है 
हरि माया को छवाते हैं 
माया को हटा दो तो 
हरि सम्मुख आते हैं 
भक्त यह राज समझ जाते हैं 
उन्हें एक ही नजर आता है 
ज्ञानी यह भेद खोल देते हैं 
हरि उनका ‘मैं’ ही बन जाता है 

दो ही तो हैं जीवन में 
एक उत्सव दूजा संघर्ष 
जीवन एक उत्सव है जब ‘तू’ बड़ा है 
संघर्ष है जब ‘मैं’ खड़ा है 
जीवन एक लीला है 
जब माया की धुंध छंट जाती है 
एक पहेली है जब तक कामना सताती है 
कामना से अमना होने की यात्रा है साधना 
भावना से निरन्तर सुख पाना ही भक्ति ! 

सोमवार, अक्टूबर 9

लीला एक अनोखी चलती



लीला एक अनोखी चलती 


सारा कच्चा माल पड़ा है वहाँ
अस्तित्त्व के गर्भ में....
जो जैसा चाहे निर्माण करे निज जीवन का !

महाभारत का युद्ध पहले ही लड़ा जा चुका है
अब हमारी बारी है...
वहाँ सब कुछ है !
थमा दिये जाते हैं जैसे खिलाडियों को
उपकरण खेल से पूर्व
अब अच्छा या बुरा खेलना निर्भर है उन पर !

वहाँ शब्द हैं अनंत
जिनसे रची जा सकती हैं कवितायें
या लड़े जा सकते हैं युद्ध,

वहाँ बीज हैं
रुप ले सकते हैं जो मोहक फूलों का
 बदल सकते हैं मीठे फलों में
परिणित किया जा सकता है जिन्हें उपवन में
या यूँ ही छोड़ दिया जा सकता है
सड़ने को !

उस महासागर में मोती पड़े हैं
जिन्हें पिरोया जा सकता है
मुक्त माल में
अनजाने में की गयी हमारी कामनाओं की
पूर्ति भी होती है वहाँ से
हम ही चुन लेते हैं कंटक....
जानता ही नहीं जो, उसे जाना कहाँ है
अस्तित्त्व कैसे ले जायेगा उसे और कहाँ ?
जो जानता ही नहीं खेल के नियम
वह खेल में शामिल नहीं हो पायेगा
लीला चल रही है दिन-रात
उसके और उसके अपनों के मध्य

हमारे तन पहले ही मारे जा चुके हैं
आत्माएं अमर हैं नये-नये कलेवर धर.... 

मंगलवार, मई 27

रास रचाएं संग वनमाली

रास रचाएं संग वनमाली



चलो झटक दें हर वह पीड़ा
जो उससे मिलने में बाधक,
सभी कामना अर्पण कर दें
बन जाएँ अर्जुन से साधक !

चलो उगा दें चाँद प्रीत का
उससे ही करें प्रतिस्पर्धा,
या फिर अंजुरी भर-भर दें दें
भीतर उमग रही जो श्रद्धा !

चलो गिरा दें सभी आवरण
गोपी से हो जाएँ खाली,
उर के भेद सब ही खोल दें
रास रचाएं संग वनमाली !

रविवार, दिसंबर 1

उन सभी अभी-अभी सेवानिवृत्त हुए भाइयों के लिए जिनका आज जन्म दिन है


बड़े भाई को जन्मदिन पर 

बिटिया के प्यारे पापा हैं
लाखों में हैं एक हमारे भैया,
 भाभी के जीवन का रंग,
दिल के बड़े हैं नेक हमारे भैया !

सुंदर चेहरा, कद भी लम्बा
बड़े सभी में लगते भी हैं,
हाफ सेंचुरी, एक दशक पर
दूजी इनिंग खेल रहे हैं !

अभी-अभी विश्राम मिला था
पुनः हाथ में ली कलम !
कर्मठता से जीया जीवन
श्रम करने का है दमखम !

पढ़ना-लिखना बहुत सुहाए
 काम से अपने रखते काम,
मौन रहें, सबकी सुनते हैं
दिल में उनके बसते राम !

आज यही कामना सबकी
साथ सदा पूरा परिवार,
बढ़ते रहें सदा ही आगे
बांटे सबको स्नेह दुलार !

जन्मदिन पर बहुत बधाई
स्वास्थ्य मिले मन का संतोष,
इसी तरह हर पल जीवन में
भरा रहे अंतर में जोश !