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बुधवार, अप्रैल 19

अनजाने गह्वर भीतर हैं

अनजाने गह्वर भीतर हैं

पल-पल बदल रहा है जीवन
क्षण-क्षण सरक रही हैं श्वासें,
सृष्टि चक्र अविरत चलता है
किन्तु न हम ये राज भुला दें !

अनजाने गह्वर भीतर हैं
नहीं उजास हुआ है जिनमें,
कौन कहाँ से कब प्रकटेगा
भनक नहीं जिनकी ख्वाबों में !

फसल काटनी खुद को ही है
जितने बीज गिराए मग में,
अनजाने या जानबूझकर
कितने तीर चलाये हमने !

तीरों की शैय्या पर लेटे
भीष्म कृष्ण की राह ताकते,
सदा साथ ही रहता आया
खुद ही उससे दूर भागते !