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बुधवार, नवंबर 29

पथ दिखाता चाँद नभ में

पथ दिखाता चाँद नभ में 


एक ज़रिया है कलम यह

हाथ भी थामे इसे जो, 

कौन जो लिखवा रहा है 

लिख रहा जो कौन है वो !


भाव बनकर जो उमड़ता 

बादलों सा कभी उर में, 

लहलहाती है फसल फिर 

अक्षरों की तब मनस में !

 

कभी सूखा मरुथलों सा 

ज्यों शब्द भी गुम हो गये,

हाथ में अपने कहाँ कुछ 

थाम ली  जब डोर  उसने !


चाह फिर क्योंकर जगायें 

हो रहा जो वही शुभ है, 

पथ दिखाता चाँद नभ में 

सूर्य  उतरा धरा पर है !


सोमवार, नवंबर 29

चाहे तो

चाहे तो 


कभी कुछ भी नहीं बिगड़ता इतना

कि सुधारा ही न जा सके 

एक किरण आने की 

गुंजाइश तो सदा ही रहती है !

माना  कि अंधेरों में कभी 

विष के बीज बो डाले थे किसी ने 

फसल नष्ट कर दे

कुदरत इतनी दयावान तो 

हो सकती है !

यहाँ अंगुलिमाल भी 

घाटे में नहीं रहता सदा के लिए 

किसी रत्नाकर की क़िस्मत 

पलट सकती है !

न भय न अफ़सोस जता 

कि बात बिगड़ी हुई 

इसी पल में बन सकती है 

संकल्प में शक्ति जगे तो 

पर्वत भी मार्ग दे देते हैं 

हर मात शह में टल सकती है 

जब ‘वही’ है सूत्रधार इस नाटक का 

चाहे तो पर्दा गिरने से पहले 

भूमिका बदल सकती है !




शुक्रवार, सितंबर 11

रह जाता वह मुस्का कर

रह जाता वह मुस्का कर


स्मृतियों के अंबार तले यह 

दीवाना सा मन पिसता है, 

जन्मों-जन्मों जो बीज गिरे 

उन फसलों में अब घिरता है !


दिन भर जतन से साधा इसको 

स्वप्नों में सभी भूल गया, 

निद्रा देवी के अंचल में 

विश्राम मिला ना शूल गया !


दिवस रात्रि यह खेल चल रहा 

कोई देखे जाता भीतर, 

जिन भूलों पर झुँझलाता उर  

बस रह जाता वह मुस्का कर !


लक्ष्य बाहरी लगते धूमिल 

यही जागने की बेला है,

चौराहे पर बाट जोहती 

मृत्यु, शेष रही नहीं मंजिल !


अब तो द्वार खुले अनंत का 

मन में गूँजे बंसी की धुन, 

चाहों के जंगल अर्घट हों 

रस्ता दें झरनों को पाहन !



 

सोमवार, फ़रवरी 17

सोये हैं हम

सोये हैं हम... 


बस जरा सी बात इतनी 
सुख की चादर ओढ़ मन पर 
खोये हैं हम 
सोये हैं हम !
एक सागर रौशनी का 
पास ही कुछ दूर बहता 
पर तमस का आवरण है 
कह इसे कई बार 
यूँ ही रोये हैं हम…!
नींद में भी जागता मन 
फसल स्वप्नों की उगाता 
जाने कितने बीज ऐसे 
बोये हैं हम !
नींद उसकी जागरण भी 
चंचला मति आवरण भी 
जाग देखें कैसी 
भावना सँजोये हैं हम !

बुधवार, अप्रैल 19

अनजाने गह्वर भीतर हैं

अनजाने गह्वर भीतर हैं

पल-पल बदल रहा है जीवन
क्षण-क्षण सरक रही हैं श्वासें,
सृष्टि चक्र अविरत चलता है
किन्तु न हम ये राज भुला दें !

अनजाने गह्वर भीतर हैं
नहीं उजास हुआ है जिनमें,
कौन कहाँ से कब प्रकटेगा
भनक नहीं जिनकी ख्वाबों में !

फसल काटनी खुद को ही है
जितने बीज गिराए मग में,
अनजाने या जानबूझकर
कितने तीर चलाये हमने !

तीरों की शैय्या पर लेटे
भीष्म कृष्ण की राह ताकते,
सदा साथ ही रहता आया
खुद ही उससे दूर भागते !