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रविवार, जुलाई 26

सबके दिल की गहराई में

सबके दिल की गहराई में 


इक भूमि की गोद में उगते 

नीम और आमों के तरुवर, 

दोनों जीवन को संजोये 

इक कटु, दूजा मृदु रस भरकर !


सबके दिल की गहराई में 

जीवन का इक अंश छिपा है, 

श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता 

स्नेहिल मृदु आँच में पका है ! 


दिल की गहराई में दीपक 

बिन बाती बिन तेल जल रहा,

श्वासों में अहर्निशा जैसे 

सहज मंत्र अनवरत चल रहा !


सुनो ध्यान से, जरा धैर्य से 

 पल भर ठहरो, झाँको भीतर 

राह बनी जाती है ख़ुद ही 

 हौले-हौले चलना जिस पर !

 

बुधवार, फ़रवरी 12

जीवन स्रोत

जीवन स्रोत 


उस भूमि पर टिकना होगा 

जहाँ प्रेम कुसुमों की गंध भरे भीतर 

 सत्य की फसल उगती है 

जहां अभेद के तट हैं 

शांति की नदी बहती है 

जब जगत में विचरने की बारी  आये 

तब भी उस भूमि की याद मिटने न पाये 

जहां एकत्व है और स्वतंत्रता 

अटूट शाश्वत समता 

जो अर्जित की गई है 

पूर्णता की धारा से 

जहाँ आश्रय मिलता है 

हर तुच्छता की कारा से 

वहीं ठिकाना हो सदा मन का 

जो स्रोत है हर जीवन का ! 



सोमवार, अप्रैल 29

मनुज प्रकृति से दूर गया है

मनुज प्रकृति से दूर गया है 


वृक्षों के आवाहन पर ही 

मेघा आकर पानी देते, 

कंकरीट के जंगल आख़िर 

कैसे उन्हें बुलावा दे दें ! 


सूना सा नभ तपती वसुधा 

शुष्क हुई हैं झीलें सारी, 

 कहाँ उड़ गये प्यासे पंछी

 तोड़ रही है दम हरियाली !


खलिहानों में प्लॉट कट रहे

माँ सी धरती बिकती जाती, 

अन्नपूर्णा जीवन दायिनी 

उसकी क़ीमत आज लगा दी !


बेच-बेच कर भरी तिजोरी 

जल आँखों का सूख गया है,

पत्थर जैसा दिल कर डाला 

मनुज प्रकृति से दूर गया है !


जगे पुकार भूमि अंतर से 

प्रलय मचा देगा सूरज यह, 

अंश उसी का है यह धरती 

लाखों वर्ष लगे बनने में !


जहां उगा करती थी फसलें 

कितने जीव जहां बसते थे, 

सीमेंट बिछा, लौह भर दिया 

मानो कब्र खोद दी सबकी ! 


हरे-भरे वृक्षों को काटा 

डामर की सड़कें बिछवायीं, 

मानव की लिप्सा सुरसा सी 

पर चतुराई काम न आयी !


बेबस  किया आज कुदरत ने

 तपती सड़कों पर चलने को, 

लू के दंश झेलता मानव 

मान लिया मृत जीवित भू को !


अब भी थमे विनाश का खेल 

जो शेष है उसे सम्भालें, 

पेड़ उगायें उर्वर भू पर 

पूर्वजों की राह अपनायें !


एक शाख़ लेने से पहले 

पूछा करते थे पेड़ों से, 

अब निर्जीव समझ कर हम तो 

कटवा देते हैं आरी से !


क्रोध, घृणा, लालच के दानव 

समरसता को तोड़ रहे जब,

छल-छल, रिमझिम की प्यारी धुन 

सुनने को आतुर हैं जंगल! 



मंगलवार, अप्रैल 5

प्रकाश की एक धारा


प्रकाश की एक धारा

प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है
भले नजर न आये सरस्वती सी
गहराई की थाह नहीं जिसकी
और शीतल इतनी कि गोद में उसकी
अग्नि भी विश्राम पाती है !
उठती लहरें अन्तरिक्ष तक ऊंची
छलक जातीं बूंदें जहाँ-जहाँ
बन जाती वह भूमि यज्ञ शाला
आचमन करने वाला उर
तृप्त हो जाता
उसके सिवा कुछ भी जिसे
 छू भी नहीं पाता
पावन वह धारा
अजस्र भीतर रहती है !
प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है ! 

शुक्रवार, जून 7

एक रास्ता है मन

एक रास्ता है मन

मन मानो भूमि का एक टुकड़ा है
उगाने हैं जहाँ उपवन फूलों भरे
जहाँ बिन उगाये उग आते हैं
खर-पतवार
हो सकता है अनजाने में गिराए हों बीज उनके भी
समय की अंतहीन धारा में  
जिस पर पनपे-उजड़े अनंत बार
कितने पादप कितने वृक्ष
पर अब जब कि पता चल गया है
पता उस खुशबू का
जिसकी जड़ छिपी है मन की ही माटी में कहीं गहरे
तो उपवन सजाना है
उसी को खिलाना है

मन मानो एक मदारी है
जब तक हम उसकी हरकतों पर बजाते हैं तालियाँ
तब तक दिखाता रहता है वह खेल
जिसे मिटाना ही है
उसे बड़ा क्यों करना
जिससे मुक्त होना ही है
उससे मोह क्यों लगाना
जिससे गुजरना भर है
क्यों बनाना उस पथ पर घर
एक रास्ता है मन
जो पार करना है
जब खो जाते हैं सारे अनुभव
तब कोई देखने वाला भी नहीं बचता
नाटक बंद होते ही
घर लौटना होगा
घर आना ही होगा हरेक को
एक यात्रा है मन
जो घर तक ले जाएगी....