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सोमवार, फ़रवरी 26

कब खुलता यहाँ द्वार तेरा

कब खुलता यहाँ द्वार तेरा 


दिल में ढेरों लिए कामना 

जब कोई याचक आता है, 

‘मैं’ पा लूँगा  परम शक्ति से  

स्वयं को वही भरमाता है !


तब तक नहीं खुला करता है 

द्वार सदा जो खुला हुआ है, 

जब ख़ाली हो मन हर शै से 

तत्क्षण प्रियतम मिला हुआ है !


‘तू’ कहकर जब ढूँढा उसको 

‘मैं’ भी संग हुआ छलता है, 

उसके सिवा न कोई जग में 

सत्य प्रकट पल-पल करता है 


तम से ढका हुआ मन भारी 

बुद्धि चंचला दौड़ लगाये, 

सत के पार विचरता है जो 

कैसे उसकी आहट आये !


एक ही रस्ता एक उपाय 

अर्पण कर सब रहें अमानी, 

जिसने कुछ न चाहा जग में 

‘स्वयं’ की महिमा उसने जानी !