कब खुलता यहाँ द्वार तेरा
दिल में ढेरों लिए कामना
जब कोई याचक आता है,
‘मैं’ पा लूँगा परम शक्ति से
स्वयं को वही भरमाता है !
तब तक नहीं खुला करता है
द्वार सदा जो खुला हुआ है,
जब ख़ाली हो मन हर शै से
तत्क्षण प्रियतम मिला हुआ है !
‘तू’ कहकर जब ढूँढा उसको
‘मैं’ भी संग हुआ छलता है,
उसके सिवा न कोई जग में
सत्य प्रकट पल-पल करता है
तम से ढका हुआ मन भारी
बुद्धि चंचला दौड़ लगाये,
सत के पार विचरता है जो
कैसे उसकी आहट आये !
एक ही रस्ता एक उपाय
अर्पण कर सब रहें अमानी,
जिसने कुछ न चाहा जग में
‘स्वयं’ की महिमा उसने जानी !
