निज के मुखड़े पर धूल लगी
दर्पण को दोष दिए जाते
हिंसा जब मन में बसती हो
अवसर भी उसके मिल जाते
स्वीकार किया जिस क्षण सच को
झर जाता हर संशय उर से
मन इक बगिया सा खिल जाता
मिटते बादल भय के डर के
अपने वैभव को जला दिया
जिस क्षण हिंसा का साथ दिया
कटुता जो सही नहीं जाती
खुद में थी जग को दोष दिया
कितने कलुषित वे क्षण होंगे
जिनमें विद्वेष पला करता
भुला अस्मिता गौरव निज का
मानव हर बार छला जाता
दर्पण को दोष दिए जाते
हिंसा जब मन में बसती हो
अवसर भी उसके मिल जाते
स्वीकार किया जिस क्षण सच को
झर जाता हर संशय उर से
मन इक बगिया सा खिल जाता
मिटते बादल भय के डर के
अपने वैभव को जला दिया
जिस क्षण हिंसा का साथ दिया
कटुता जो सही नहीं जाती
खुद में थी जग को दोष दिया
कितने कलुषित वे क्षण होंगे
जिनमें विद्वेष पला करता
भुला अस्मिता गौरव निज का
मानव हर बार छला जाता
