संशय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संशय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, नवंबर 5

अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व और हम 


जब सौंप दिया है स्वयं को 

अस्तित्त्व के हाथों में 

तब भय कैसा ?

जब चल पड़े हैं 

कदम उस पथ पर

उस तक जाता है जो 

तो संशय कैसा  ?

जब बो दिया है बीज प्रेम का  

अंतर में उसने ही 

तो उसके खिलने में देरी कैसी  ?

जब भीतर उतर आये हैं 

शांति के कैलाश 

तो गंगा के अवतरण पर 

भीगने से संकोच कैसा  ?

अपना अधिकार लेने में

 यह झिझक क्यों है 

हम उसी के हैं, और वही 

हम बनकर जगत में आया है 

जब जान लिया है या सत्य 

तब यह नाटक कैसा  ?

उसी को खिलने दो 

बढ़ने दो 

कहने दो 

अब अपनी बात चलाने का 

यह आग्रह कैसा  ?

डूब जाओ 

उसके असीम प्रेम में 

किसी तरह 

वह यही तो चाहता है 

फिर उससे भिन्न होने का 

भ्रम कैसा ? 


मंगलवार, अक्टूबर 1

मिट जाएँगे संशय उर से

मिट जाएँगे संशय उर से 


झाँकें कान्हा के नयनों में

प्रेम समंदर एक झलकता, 

डूब गई थी राधा जिसमें 

थाह न कोई जिसकी पाता !


अनगिन नाम दिये हैं जग ने

बाला-लाला कहा कन्हाई, 

प्रीत किंतु इतनी असीम है

जाती न शब्दों में बताई !


सुख-दुख दोनों रहे किनारे 

मध्य में आनंद की धारा, 

राधा बनकर जो बहती है 

यमुना तट पर जिसे पुकारा !


आनंद से उपजी है सृष्टि 

कृष्ण वही आनंद का स्रोत, 

हाथ थाम लें, उसे थमा दें  

 मिटेगा दोनों में हर क्षोभ !


कान्हा दिल की गहराई में 

बसा हुआ मीठी धुन टेरे 

कान लगा कर सुनना इसको 

खिल जाएँगे तन-मन तेरे !



गुरुवार, जुलाई 16

माया

माया 


कभी दर्द दिया 
कभी मुस्कानें
कभी रोये औरों के दुःख पर 
फिर दिए उन्हीं को ही ताने
कभी राह दिखाई मंजिल की 
कभी मन में  संशय भर डाला
कभी रोका जिस पथ चलने से 
फिर उसका पता बता डाला ! 
रिश्तों की ऐसी माया है 
कोई पार निकल कर ही जाने 
यह निज कर्मों की खेती है 
सुख-दुःख के बोये थे दाने !


सोमवार, दिसंबर 23

मन इक बगिया सा खिल जाता

मन इक बगिया सा खिल जाता



निज के मुखड़े पर धूल लगी
दर्पण को दोष दिए जाते
हिंसा जब मन में बसती हो
अवसर भी उसके मिल जाते

स्वीकार किया जिस क्षण सच को
झर जाता हर संशय उर से
मन इक बगिया सा खिल जाता
मिटते बादल भय के डर के

अपने वैभव को जला दिया
जिस क्षण हिंसा का साथ दिया
कटुता जो सही नहीं जाती
खुद में थी जग को दोष दिया

कितने कलुषित वे क्षण होंगे
जिनमें विद्वेष पला करता
भुला अस्मिता गौरव निज का
मानव हर बार छला जाता

बुधवार, जनवरी 2

वही तो हर राह है



प्रिय मित्रों,
 नए वर्ष में यह पहली रचना पोस्ट कर रही हूँ, इस उम्मीद के साथ कि समय बदलेगा, जो अँधेरा आज छा गया है, छंटेगा, यह बदलाव हमें और आपको ही लाना है, महिलाओं को सम्मान पूर्वक निर्भय होकर जीने का हक है और यह अधिकार उनसे कोई नहीं छीन सकता, समाज को अपनी गलत सोच को बदलना ही होगा. दृढ विश्वास ही हमें सफल करेगा. आप सभी को इस नए वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनायें... 


वही तो हर राह है

इक तिलस्मी ख्वाब गाह है
वह जो हर दिल की चाह है !

चाह ही तो बाँधती है
वरना वही तो हर राह है !

कुछ नहीं हम, कह रह वे  
फिर आती कहाँ से आह है !

संशय बना है ईंधन
बुझती नहीं जो दाह है !

उजाले घेर ही लेते
मिलती अगर पनाह है !