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गुरुवार, अक्टूबर 9

देवियाँ

देवियाँ 


सीता, धरा की पुत्री 

भूमिजा है 

भूमि सिखाती है, कर्म का वर्तन  !

सहज ही आता है 

उनके वंशजों को 

भू, जल, और पर्वतों का  

संरक्षण !


लक्ष्मी, सागर पुत्री 

जलजा है  

जल बहना सिखाये 

उर में भक्ति जगाये  !!

जल निधियों का स्रोत 

 मन को तरल बनाये  !


 सरस्वती आकाश पुत्री 

नभजा 

गगन है ज्ञान  !

अस्पृश्य रह जाता है 

हर विषमता से 

विवेक जगाता है ! 


पर्वत पुत्री उमा 

पार्वती है !

दुर्गा बन शौर्य जगाती 

गौरी बन आनंद बरसाती ! 


यज्ञ की ज्वालाओं से 

प्रकट हुई द्रौपदी 

अग्नि करती है पावन 

महाभारत की नायिका 

सदा करे कृष्ण का अभिनंदन ! 


मंगलवार, फ़रवरी 16

ताल-लय हर हृदय प्रकटे

ताल-लय हर हृदय प्रकटे 



गा रही है वाग देवी  
गूँजती सी हर दिशा है, 
शांत स्वर लहरी उतरती 
शुभ उषा पावन निशा है !

श्वेत दल है कमल कोमल 
श्वेत वसना वीणापाणि,
राग वासन्ती सुनाये 
वरद् हस्ता महादानी !

ज्ञान की गंगा बहाती
शांति की संवाहिका वह,
नयन से करुणा लुटाये 
कला की सम्पोषिका वह !

भा रही है वाग देवी 
सुन्दरी अनुपम सलोनी, 
भावना हो शुद्ध सबकी
प्रीत डोरी में पिरोनी ! 

जागे मेधा जब सोयी
अर्चना तब पूर्ण होगी,
ताल-लय हर हृदय प्रकटे 
साधना उस क्षण फलेगी !

सोमवार, मार्च 11

महाकुम्भ के समापन पर



महाकुम्भ के समापन पर

कल-कल छल-छल बहती गंगा
यमुना जिसमें आ कर मिलती,
यही त्रिवेणी है प्रयाग की
छुपी है जिसमें सरस्वती !

इस अति पावन तीर्थराज में
कुम्भ पर्व की शोभा न्यारी,
हरिद्वार, नासिक, प्रयाग में
तब उज्जैन की आती बारी !

देव उतर आते हैं भू पर
सूर्य, चन्द्र, गुरु भी मिलते,
घुल जाता है मानो अमृत
लाखों अंतर भाव से खिलते !

सूर्य मकर राशि में  होता
दिग दिगांतर हुए प्रफ्फुलित,
आए दूर से जन सैलाब
श्रद्धा के हों दीप प्रज्ज्वलित !

भगवद गाथा संत सुनाते
अद्भुत साधुजन आते हैं,
नव इतिहास गढ़ा जाता है
मिल कर सारे कुम्भ नहाते !

एक अजूबा है धरती का
 भारत भू का पर्व निराला,
नागा साधुओं के अखाड़े
इक तिलस्म सा ज्यों रच डाला