कोई कोई ही पहुँचे घर
हर सुख की छाया दुःख ही है
जो संग चली आती उसके,
हर चाह अचाह छुपाए है
देखेगा, होश जगे जिसके !
चाहों से यह जग चलता है
पर टिका हुआ अचाह बल पर,
मंज़िल दोनों के पार खड़ी
कोई कोई ही पहुँचे घर !
जग दो की फ़िक्र सदा करता
आज हँसे कल रोए वाला,
आख़िर कब तक माया बाँधे
दे आवाज़ बाँसुरी वाला !
योग अधूरा मन का जब तक
मानव खुद को छलता रहता,
प्रेम तंतुओं का जो पुतला
बिरहन सा दुःख सहता रहता !
.jpg)
