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बुधवार, जनवरी 11

कोई कोई ही पहुँचे घर

कोई कोई ही पहुँचे घर


हर सुख की छाया दुःख ही है 

जो संग चली आती उसके, 

हर चाह अचाह छुपाए है 

देखेगा, होश जगे जिसके !


चाहों से यह जग चलता है 

पर टिका हुआ अचाह बल पर, 

मंज़िल दोनों के पार खड़ी 

कोई कोई ही  पहुँचे घर !


जग दो की  फ़िक्र  सदा करता 

आज हँसे कल रोए वाला, 

आख़िर कब तक माया बाँधे 

दे आवाज़ बाँसुरी वाला !


योग अधूरा मन का जब तक 

मानव खुद  को छलता रहता

प्रेम तंतुओं का जो पुतला 

बिरहन सा दुःख सहता रहता !


बुधवार, अक्टूबर 11

सुख-दुःख


सुख-दुःख 

सुख की तृष्णा एक भ्रम ही तो है
दुःख की पकड़ ही असली चीज
दुःख अपने होने का सबूत देता है
सुख है खुद को मिटाने की तरकीब
सुख बंट रहा है बेमोल पर नहीं कोई उसका खरीदार
दुःख की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, पर 
अमीर कहलाने की जैसे सबको है दरकार
सुख मुक्त करता है दुनिया के जंजाल से
कुछ ‘होने’ का भरोसा दिलाता दुःख व्यस्त रखता है हर हाल में
दुःख से छूटना है तो सुख को देनी होगी राह
मित्र उसको बनाने की भरनी होगी भीतर चाह