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रविवार, दिसंबर 11

नींद उड़ी रातों की उनकी


नींद उड़ी रातों की उनकी 

काले धन को गोरा कर लें 
इसी जुगत में हैं कुछ लोग,
नींद उड़ी रातों की उनकी 
भरे तिजोरी में जो नोट !

नोटों के बंडल के बंडल 
कर चोरों के दिल में हलचल,
दूजों के खातों  में डालें 
तरह-तरह के करते छल बल !

सोना, चाँदी तोल रहे हैं 
कहीं जमीनों के भी चक्कर,
किसी तरह भी टैक्स बचा लें 
बने हुए कैसे घनचक्कर !

जाने किस मिट्टी के बने हैं 
चैन से ऊपर धन को रखते,
इज्जत चाहे लगी दांव पर 
काले धन से बाज न आते !

आँखें फ़टी हुई रह जातीं 
अख़बारों मे वही छप रहे,
बात करोड़ों और किलों की
 बिरला, टाटा रोज बन रहे !

किन्तु न अब यह और चलेगा 
कानून अब नहीं बिकेगा,
कालाबाजारी न होगी
देश नहीं यह जुर्म सहेगा !





शनिवार, नवंबर 29

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों


हर कहानी है अधूरी
हर मन यहाँ कुछ खोजता,
रहता सदा अपूर्ण जग
मंजिल मिलेगी सोचता !

सीलें इधर सीलें उधर
पैबंद ही हैं हर तरफ,
पांव सिकोड़ें सिर खुले
धुंधले पड़ें जीवन हरफ !

मुट्ठी में सिमटी रेत ज्यों
थामें इसे, वह छूटता,
सोना नहीं पीतल था वह
हर भ्रम यहाँ है टूटता !

मिलती नहीं जग में कभी
जिस जीत की तलाश है
अपने ही भीतर झांक लें
खोलें उसे जो पाश है !


शनिवार, जुलाई 21

कैसे कोई बच सकता है


कैसे कोई बच सकता है


पलकों पे थमे झट से न गिरे
वे दो कतरे आँसू के झरे
मन भीग गया..
प्राची में जब फूल उगे
हिम शिखरों पर चांदी बिखरे
पिघले सोना सागर में जब
अवाक् हुआ मन भीग गया..

पर्वत पर छाया है किसकी
यह तुमुलनाद नभ में किसका
उन आँखों में यह कौन दिखा
मुस्कानों में झलकें किसकी
छोटा-छोटा खंड-खंड सा
वह तो मिलता ही रहता है
सोच यही मन भीग गया..

दर्पण में है सूरत किसकी
झील में ज्यों चाँद गगन का
छोटे छोटे अनुभव उसके
पर सारा का सारा वह है
बस देख यही मन भीग गया..

कैसे कोई बच सकता है
वही-वही तो चारों ओर
टुकड़ा-टुकड़ा खुद को देता
टुकड़ों में वह ही पाता है
वरना वह तो सदा बुलाए
जान यही मन भीग गया..