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सोमवार, अप्रैल 1

कुछ दिन गुजरात में - २

कुछ दिन गुजरात में - २


गिर वन्यजीव अभयारण्य 


आज सुबह हम केवड़िया से साढ़े आठ बजे रवाना हुए और शाम को सात बजे गिर पहुँच गये। संपूर्ण गुजरात में ही सड़कें बहुत अच्छी हैं, और इस मार्ग पर यातायात भी अधिक नहीं था। हमारा ड्राइवर मेहुल बहुत सुरक्षित गाड़ी चला रहा था। उसमें एक ही बात अखर रही थी, वह दिन भर पान मसाला खाता रहता और रास्ते में चलते हुए कई बार कार का दरवाज़ा खोलकर मुँह साफ़ करता। जब हम राजकोट मपहुँचे,  दो भव्य मंदिर देखने को मिले। पहला था अठाहरवीं शताब्दी के संत जलाराम का मंदिर, जिनकी कहानी चमत्कारों से भरी है। उन्हें किसी साधु ने राम की मूर्ति दी थी और कहा था हनुमान भी अपने आप पीछे आयेंगे।और ऐसा ही हुआ। मंदिर में उन स्वयंभू हनुमान की मूर्ति भी थी। दूसरा श्री खोडाल धाम मंदिर था, जो गुजरात के पटेल समुदाय ने बनवाया है। यह मंदिर भी सोमनाथ के मंदिर की तरह बना है, पर आकार में उससे छोटा है। उड़ीसा के कलाकारों ने इसकी बाहरी दीवारों पर मूर्तियों का निर्माण किया है तथा भीतर राजस्थान से मँगवायीं श्वेत संगमरमर की मूर्तियाँ हैं। जिन्हें देखने से लगता है वे अभी बोल पड़ेंगी। इस रिजार्ट में रात्रि भोजन के बाद आदिवासी सिंह नृत्य का आयोजन किया गया है। 

आज सुबह साढ़े सात बजे हम हिरण नदी के किनारे पक्षी दर्शन के लिए गये। अनेक सुंदर पक्षियों को उनके प्रकृति आवास में देखकर अति आनंद हुआ, हमने कई सुंदर तस्वीरें उतारीं। दोपहर को दो बजे जंगल सफारी के लिए जाना था। ड्राइवर लालू ने पैंतालीस किलोमीटर के निर्धारित इलाक़े में घुमाया। गाइड शैलेश भी साथ था, जिसने एशियाई बब्बर शेरों तथा जंगल के बारे में कई जानकारियाँ दीं। उसका परदादा नामधारी थे, जो पशु पालन का काम करते हैं। यहाँ सदियों पूर्व अफ़्रीका से आये लोग भी रहते हैं। इस राष्ट्रीय उद्यान में चीतल, नीलगाय,सांभर, हिरण आदि बहुतायत में मिल जाते हैं। शेरों की संख्या बढ़ने में इनका भी योगदान है। हमें एक नर शेर दिखायी दिया, फिर शेरनी व उसके दो बच्चे भी। शाम को लौटे तो सूर्यास्त होने को था। शाम को रिजार्ट वालों की तरफ़ से कुछ खेल खिलाए गये। इसके बाद गिर के जंगलों पर आधारित एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी दिखायी गई। 


सोमनाथ 


आज का दिन भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। आज अयोध्या में श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम पूरी गरिमा के साथ संपन्न हो गया। मोदी जी ने बहुत अच्छा भाषण दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल भी वहाँ उपस्थित थे। आज सुबह भी हम सफारी के लिए गये थे, एक शेर के दर्शन हुए। लगभग साढ़े ग्यारह बजे सासन गिर से निकले और एक घंटे में द्वारिका स्थित होटल सरोवर पोर्टिको पहुँच गये। रास्ते में मोबाइल पर प्राण प्रतिष्ठा का सीधा प्रसारण देखते रहे। दोपहर तीन बजे तक यह कार्यक्रम चलता रहा। संध्या पूर्व हम प्रभास क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर में दर्शन के लिए गये। मोबाइल व घड़ी पहले ही जमा करवा ली जाती है। मंदिर बहुत भव्य है। मंदिर के कलश पर स्वर्ण की परत लगायी गई है, जो दस टन का है ।इसके बाद हम भालका तीर्थ के मंदिर के दर्शन के लिए भी गये। कृष्ण के देह त्याग की सुंदर मूर्ति वहाँ स्थापित है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर पर विश्राम कर रहे थे, तब जरा नामक एक शिकारी ने भूल से उन पर तीर चलाया था, जो उनके पैर के तलुवे में लगा था। इसी स्थान पर कृष्ण ने इहलोक की लीला समाप्त की थी। 


शाम को हम मंदिर के निकट समुद्र तट पर गये, जहाँ हज़ारों की संख्या में उत्साहित भीड़ एकत्र थी। सूर्यास्त के प्रकाश में सागर का जल सोने का सा चमक रहा था। सैकड़ों की संख्या में जल पक्षी उड़ रहे थे और नि:शंक लोगों के पास आकर बैठ रहे थे। हमने कुछ समय वहाँ बिताया फिर मंदिर में  आ गये। लेजर शो की टिकट लेकर कार्यक्रम की प्रतीक्षा करने लगे। धीरे-धीरे वहाँ लोग उपस्थित होने लगे और सारा प्रांगण भर गया। पहले आरती हुई, फिर कीर्तन करवाया गया।इसके बाद हमने सोमनाथ मंदिर के इतिहास को ध्वनि व प्रकाश के अद्भुत शो के माध्यम से मंदिर की दीवारों पर सजीव होते देखा।  कल हमें द्वारिका जाना है। 



परमात्मा कण-कण में है, तीर्थों में उसकी अनुभूति की जा सकती है। जैसे हवा हर जगह है पर पंखे के नीचे बैठकर उसका अनुभव तीव्रता से होता है। सोमनाथ का यह पावन तीर्थ हृदय को हृदय को पावन करने वाला है। युगों पूर्व इसका निर्माण राजा सोम ने करवाया था, जो क्षय रोग से पीड़ित हो गये थे। उन्होंने तप किया, शिव प्रकट हुए। हर युग में इस मंदिर की स्थापना पुन: पुन: होती रही। गजनी के बाद न जाने कितने आक्रांताओं ने इसे तोड़ा और इसकी अकूत सम्पति को साथ ले गये , पर भारत की अक्षुण्ण संस्कृति की यह शाश्वत सामर्थ्य और परंपरा है जिसने इसे बार-बार सृजित किया। इस स्थान की पवित्रता को कोई कैसे ले जा सकता था। शिव की ऊर्जा जो यहाँ स्थायी रूप से स्थापित है उसे नष्ट करने का कोई साधन उनके पास नहीं था। वह ऊर्जा ही समय-समय पर भक्तों के हृदयों में निर्माण का बल भरती रही और आज़ादी के बाद यह सुंदर तीर्थ जो आज हमारे सम्मुख है, प्रकट हुआ। सोम का अर्थ है चंद्रमा, जो मन का प्रतीक है। मन का जो नाथ है वह कल्याणकारी शिव ही प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में यहाँ स्थापित है, उसी का अंश आत्मज्योति के रूप में हमें अपने भीतर जलाना है। जब मन हर कुटिलता को छोड़कर सुडौल पत्थर की भाँति तराश लिया जाएगा तब वह शिवलिंग की भाँति शांति प्रदायक बनेगा। उसकी पूजा दूध, घी, दही, बेल पत्र, मधु, जल, पुष्प आदि से होती है, जो हमारी भावनाओं के प्रतीक हैं। तीनों गुणों से ऊपर उठकर जब हम अपने ह्रदय को आनंद, प्रेम और शांति के त्रिपुंड से सजाते हैं, तब सोमनाथ की कृपा का अनुभव होता है।        






बुधवार, नवंबर 17

मन उपवन

मन उपवन 

शब्दों के जंगल उग आते हैं 

घने और बियाबान 

तो सूर्य का प्रकाश 

नहीं पहुँच पाता भूमि तक 

मन पर सीलन और काई 

की परतें जम जाती हैं 

जिसमें गिरते हैं नए-नए बीज

और दरख्त पहले से भी ऊँचे 

प्रकाश की किरणें ऊपर-ऊपर 

ही रह जाती हैं 

मन की माटी में दबे हैं 

जाने कितने शब्द 

स्मृतियों के घटनाओं 

और पुराने जन्मों के 

उपवन उगाना है तो 

काटना होगा इस जंगल को 

सूर्य की तपती धूप 

झेलनी होगी ताकि 

सोख ले सारी नमी व काई मिट्टी की 

खुदाई कर निकाल फेंकनी होंगी 

पुरानी जड़ें 

व्यर्थ के खर-पतवार 

फिर समतल कर माटी को 

सूर्य की साक्षी में 

नए बीज पूरे होश में बोने होंगे  

तब फूल खिलेंगे श्रद्धा और विश्वास के 

आत्मा का परस जिन्हें हर पल सुलभ होगा ! 


गुरुवार, दिसंबर 31

सांझी धरती गगन एक है

सांझी धरती गगन एक है
है सृष्टि क्रम अनंत काल से 
चाँद-सितारे भी युग-युग से, 
किन्तु पुरातन कभी न होते 
पल-पल खुद को नूतन करते !

जंगल, वन, पर्वत, पठार भी 
मृत होकर नव जीवन धरते, 
सिन्धु पुन: पुन: हो आप्लावित 
बादल नित नव सर्जन करते !

पशु, पंछी, मानव के तन भी
जन्मते, गिरते, पुन: पनपते, 
किन्तु एक से सब दुनिया में 
मन को इक चौखट में रखते ! 

अपना-अपना खुदा लिए हर 
मन न स्वयं को कभी बदलता, 
धर्म-जातियों के नामों  पर 
अब भी भीतर नफरत रखता !

जाने क्या हासिल कर लेगें  
अब भी रक्त बहाया करते, 
नए वर्ष में यही सिखाने 
जगत घिरा सांझी पीड़ा से ! 

सांझे सुख-दुख हैं दुनिया के 
सांझी धरती, गगन एक है,
एक ही रब है एक चेतना 
नाम-रूप धारे अनेक है ! 
 

गुरुवार, मार्च 26

प्रकृति और मानव

प्रकृति और मानव 

एक मास्टर स्ट्रोक मारा उसने 
और बता दिया... कौन है मालिक ?
चेतावनी दी थी 
सुनामी भेजी, कई तूफान भेजे
भूमिकम्प में भी राज खोला था 
इबोला में भी वही बोला था 
पर हमारे कान बहरे थे 
नहीं सुनी हमने प्रकृति की पुकार 
जो लगा रही थी वह बार बार 
जारी रखा अपनी कामनाओं का विस्तार 
भूल गए अपने ही स्रोत को 
भूल गए कि.. हम प्रकृति के स्वामी नहीं 
हैं उसका ही अंग  
सुविधाओं के लोभ में  निरंकुश दोहन कर, 
कर रहे खुद से ही जंग  
जंगल खत्म हो रहे और 
हवा में घुलता जा रहा था जहर 
 सागरों की अतल गहराई तक प्लास्टिक का कचरा 
अब बैठे हैं अपने-अपने घरों में 
नहीं भर रहे नालियों में पॉलीथिन, प्लास्टिक के ग्लास और कटोरे 
बन्द है पार्टियों में व्यर्थ का आडम्बर 
कुछ दिनों के लिए ही सही 
जो भी व्यर्थ है, वह हमसे छुड़वाया जा रहा है 
कोरोना के बहाने हमें दर्पण दिखाया जा रहा है !

सोमवार, अक्टूबर 29

मन माटी से जैसे कोई


मन माटी से जैसे कोई


ऊँचे पर्वत, गहरी खाई
दोनों साथ-साथ रहते हैं,
कल-कल नदिया झर-झर झरने
दोनों संग-साथ बहते हैं !

नीरव जंगल, रौरव बादल
दोनों में ना अनबन कोई,
शिव का तांडव, लास्य पार्वती
दोनों में ही प्रीत समोई !

गीत प्रीत के, सहज जीत के
चलो आज मिल कर गाते हैं,
 नित्य रचे जाता नव संसृति 
उस अनाम को जो भाते हैं !

थिर अंतर में शब्द किसी का
लहरों का वर्तुल बन चहके,
मन माटी से जैसे कोई
अंकुर फूट लता बन महके !

भीतर-बाहर एक हुआ सब
सन्नाटा आधार सभी का,
मौन अबूझ शब्द हैं सीमित
दोनों में आकार उसी का !


मंगलवार, मई 6

नदी मन की

 नदी मन की


संकल्प और विकल्प
 दो तटों के मध्य
नदी बहती है
हम किनारों पर ही बैठे बैठे
देखते रहते, जान नहीं पाते
वह क्या कहती है !

कभी घने जंगलों से गुजरती
कभी कठोर स्थलों से फिसलती
हम लुटते-कटते, अंजान से बिंधते
देख नहीं पाते
वह क्या सहती है 

बुधवार, नवंबर 27

उसकी यात्रा

उसकी यात्रा



फिर लौट आया है मन  
बियाबान जंगलों में बसे गाँव में
जहाँ आबादी के नाम पर
विचारों के झुंड हैं
ऊंचे दरख्तों को चूमते
पर्वतों पर चढ़ते
 आस-पास को छूते हुए चलते
कुछ हसीन विचार.. कुछ गमगीन विचार भी
जहाँ प्रातः होते ही सूर्य उगता है
 देख सकता है मन
सात तालों से बंद कमरे में भी
सूरज की लालिमा
बादलों के बदलते रंग
 जहाँ रोज रात को चाँद निकलता है
 झरनों, नदियों, नालों पर किरणों की अठखेलियाँ
देख सकता है
रेड स्क्वायर के चारों ओर लिपटी धूप में
पंछियों को भी
सोचें जितनी हसीन होती हैं
जीना उतना ही आसान
आस-पास की कड़वाहट
छू भी नहीं पाती
जब मन मीठे दरिया के समीप होता है
कभी घनी अँधेरी गुफा में भटकता
 कभी सीमा पार कर जाता
कभी किसी गहरे समुंदर को पार करता
 कभी दूर आकाश से उतरते
पैराशूट के सहारे
हिचकोले खाता
 कभी नक्सलवादी बन न्याय मांगता
आतंक जगाता मन !

शनिवार, अक्टूबर 19

मन माँगे मोर




मन माँगे मोर

कहीं वह जंगल में नाचने वाला
मोर तो नहीं, जो मन माँगता है
है खुद भी तो मयूर पर  
यह नहीं जानता है...
 
या फिर ‘मेरा मन’  मांगता है 
‘तेरे’ का जिसे पता नहीं
वह ‘मेरे’ का ही राग अलापता है..

क्या कहा ? यह आंग्ल भाषा का शब्द है
‘ज्यादा’ का जो देता अर्थ है
तो कृपण मन कहाँ सम्भालेगा
 उसकी तली में तो हजारों छिद्र हैं
क्या नहीं लुटाया माँ ने प्यार अपार
  खाली नजर आता
 क्यों मन का संसार
क्या नहीं लुटा रहा परमात्मा
 नेमते हजारों हजार
 कर अनदेखा गीत वही गा  
चलता रहा व्यापार
अब लुटाने का मौसम आया है
 दीयों ने लुटाया है उजाला
और मौसम ने बहार !

आने वाले प्रकाश पर्व की बहुत बहुत बधाई !
 विदेश यात्रा का सुयोग बना है, अब वापस आकर नवम्बर में मुलाकात होगी.


गुरुवार, जून 7

मौन का उत्सव


मौन का उत्सव

ठठा कर हँसा वह
नजरें जो टिकीं थीं सामने
लौटा लीं खुद की ओर
और तभी गूंज उठा था सारा जंगल
उस मुखर अट्टाहस से....
ठिठक गए पल भर को
आकाश में गरजते मेघ
सुनने उस हास को
थम गया सागर की लहरों का तांडव
थमी थी जब वह हँसी
और भीतर मौन पसरा था
वहाँ कोई भी नहीं था
जैसे चला गया था कोई परम विश्राम को
अनंत समय बीता कि क्षणांश
कौन कहे
जब एक स्पंदन हुआ फिर
द्वार दरवाजे खुलने लगे
झरने लगे जिसमें से
सुगीत और आँच नेह की
जिसमें डूबने लगा था
सारा अस्तित्त्व
आज उसने स्वयं को उद्घाटित होने दिया था
अब महोत्सव की बारी थी..


मंगलवार, जून 5

दुलियाजान में तेंदुआ


३ जून २०१२ को असम के डिब्रूगढ़ जिले की तेल नगरी दुलिया जान में एक तेंदुआ जंगल से भटक कर आ गया, १३ लोगों को घायल कर स्वयं शिकार हुआ वन्य अधिकारी की गोली का, मृत तेंदुए को पिंजरे में बंद करके ले जाया गया तब सैकड़ों की भीड़ वहाँ खड़ी थी पर शायद ही किसी की आँखें नम हों, जंगल के उस बेताज बादशाह के लिये.  


दुलियाजान में तेंदुआ

कोई शहरी भूले से जंगल में भटक जाये
तो शायद उसकी जान खतरे में पड़ सकती है,
पर कोई जंगली पशु जब निकल पड़ता है
किसी कारण से जंगल तजकर
तो उसकी शामत निश्चित आ जाती है...
घायल करे कोई पशु, स्वयं चोट खाकर
यह स्वाभाविक है..
किन्तु जान ले ले उत्तेजित भीड़
किसी पशु की,
 यह अपराध नहीं तो क्या है..?
पर नहीं दी जायेगी जिसकी सजा
जंगल कटते रहेंगे, आश्रय हीन पशु भटकते रहेंगे
और होंगे शिकार मानव की तथाकथित समझदारी के...
इंसान ने बड़ा न होने की कसम खाली है शायद
ताउम्र बच्चा ही बना रहता है
अजूबा तो नहीं था तेंदुआ
चला जाता अपने आप
जैसे चुपचाप आया था
उसे दिया जाता यदि मार्ग
लेकिन लाठियों, पत्थरों से मार कर
बाध्य किया उसे हिंसक होने को
विश्व पर्यावरण दिवस पर
यह कैसा उपहार दिया जंगल को मानव ने
अखबार के मुखपृष्ठ पर छपी है
तस्वीर उस अभागे तेंदुए की
घायल हुए हैं तेरह लोग भी
शौक चढ़ आया कुछ को
संभवतःबहादुरी दिखाने का
निहत्थे निकल पड़े जूझने उससे
कुछ बदला लेने पर हो गए उतारू
और देखती रही...
सैकड़ों की भीड़ तमाशबीन बनी
सचमुच भीड़ का कोई विवेक नहीं होता
ऐसी भीड़ जब घिर आये चारों ओर
उत्तेजना फैली हो वातावरण में
तो संतुलन खो देगा कोई भी
वह तो एक जंगली पशु था...
एक जिम्मेदारी भी चाहिए
 इंसान के दिल को परिपक्व होने के लिये
व्यर्थ ही उछलता दिल
कभी-कभी घायल हो जाता है
अपने ही हाथों
मंशा नहीं होती उसकी
न आहत करने की न आहत होने की
पर अनजाने में घट जाते हैं दोनों ही
बाद में जितना सोचे,
मुक्त नहीं होता वह निज कृत्यों से
यदि वह मालिक बना रहता है तो..
यदि मान लिया है खुद को प्रकृति का एक अंश
अस्तित्त्व उसकी सम्भाल करता ही है... 

रविवार, फ़रवरी 5

ऊपर हँसते भीतर गम था


ऊपर हँसते भीतर गम था


जाने कैसी तंद्रा थी वह
कितनी गहरी निद्रा थी वह,
घोर तमस था मन पर छाया
ढके हुए थी सब कुछ माया !

एक विचारों का जंगल था
भीतर मचा महा दंगल था,
खुद ही खुद को काट रहे थे
कैसा फिर ? कहाँ मंगल था !

अपनों से ही की थी दुश्मनी
कभी किसी सँग बात न बनी,
एक अबूझ डर भीतर व्यापा
भृकुटी रही सदा ही तनी !

एक नर्क का इंतजाम था
आधि-व्याधि का सरंजाम था,
ऊपर हँसते भीतर गम था
भावनाओं का महा जाम था !

लेकिन कोई भीतर तब भी
जाग रहा था देखा जब भी
बड़ा सुकून मिला करता था
बाहर लेकिन दुःख था अब भी

धीरे-धीरे वह मुस्काया
पहले पहल स्वप्न में आया,
सहलाया रिसते जख्मों को
फिर तो अपने पास बुलाया !

एक झलक अपनी दिखलाई
लेकिन फिर न पड़े दिखाई,
एक खोज फिर शुरू हो गयी
भीतर की फिर दौड़ लगाई !

कही प्रार्थना अश्रु बहाए
निशदिन मन उसको ही बुलाए,
दिन भर काम में भूल गया हो
पर नींदों में वही सताए !

शनैः शनैः फिर राह मिल गयी
आते-जाते कली खिल गयी,
सुरभि बिखेरे अब विकसित हो
जब प्रमाद की चूल हिल गयी !

अब तो मीत बना है मन का
भेद बड़ा पाया जीवन का,
उससे मिलने ही हम आये
यही लाभ है सुविधा धन का !