शुक्रवार, फ़रवरी 11

चलन दुनिया का

चलन दुनिया का

 जग का पहिया झूठ से चलता 
भागे कोसों सच से डरता,  
सदा मुखौटा ओढ़े रहता
पाखंडों पर ही यह पलता !

जाने किसका महाजाल है
जाने इस को क्या मलाल है,
थोड़ी सी वाह वाही सुन के
क्या पा लेने का ख्याल है ?

वाणी का वरदान था पाया
व्यर्थ ही उससे राग बढ़ाया,
झूठे आश्वासन को पोषा
वाणी को हथियार बनाया !

सम्बन्धों की गरिमा खो दी
झूठ ने सारी महिमा धो दी,
सच के बाने पहने आता
 दिल में दूरी, कटुता बो दी !

अनिता निहालानी
१० फरवरी २०११


गुरुवार, फ़रवरी 10

हँसना मना है


 
ए जी,खायेंगे न ?

“ए जी, चलेंगे न” की जब
श्रीमती ने लगाई पांचवी बार गुहार
तो झकमार, जूता पहन, श्रीमान
हो गए सांध्य भ्रमण को तैयार !

साथ ही चलने लगा अंतर्मन में
धाराप्रवाह सोचविचार,
कुछ स्वास्थ्य पत्रिकाओं का असर
कुछ आस-पड़ोस का देख व्यवहार
रोज-रोज चढ़ने लगा है  
श्रीमती जी को टहलने का बुखार !

कहाँ गए वे दिन
जब रहा करतीं थीं व्यस्त,
बनाने में पापड़ और अचार
और इत्मीनान से चाय पीते
वह पढ़ा करते थे अखबार !

आज जिसे देखो वजन घटाने में लगा है
सेहत का हो रहा है गर्म बाजार
या फिर वजन नहीं उम्र घटाना चाहते हैं लोग
बुढ़ापे में हो जाता है अक्सर
जिंदगी से दुगना प्यार !

लगा विचारों को ब्रेक,
सामने आ गयी थी एक कार
पत्नी ने टोका, “कहाँ खो गए सरकार ?”
देखा कनखियों से, आ गया था
अचानक उनके चेहरे पर निखार !     

नजर दौड़ाई तो दिखा एक ठेले वाला
कर रहा था जो गोलगप्पों का व्यापार
एजी, खायेंगे न, आँखों ही आँखों में
पढ़ लिया श्रीमती का इसरार !

अनिता निहालानी
१० फरवरी २०११  



बुधवार, फ़रवरी 9

आत्मा का वस्त्र

आत्मा का वस्त्र

वह ठंड से कांप रही थी
सिकुड रही थी, ठिठुर रही थी
उस दिन मैंने उसे बर्फीले बियाबान में
सिसकते देखा,
याद है मुझे उस दिन मैंने चोरी की थी
और वह दिन भी याद है
जब विष में बुझे कटु वचन कहे थे
कहने से पूर्व मंत्र की तरह जपे थे
लहुलुहान हो गयी थी वह
अश्वथामा की तरह मणिविहीन !

भटकते हुए भी देखा उसे
जब-जब किया विश्वासघात
जब-जब हुआ पतन
हर बार वह चीखी,

आखिर उसकी पुकार को
कब तक अनसुना करती
एक दिन उसे पुचकारा
सहलाया, और घटा चमत्कार
एक आश्वासन पाते ही वह नूतन हो गयी !

अब मैं उसके लिये वस्त्र बुनती हूँ
कोमल, नरम, गर्म वस्त्र
उसके लिये अपना अंतर सजाती हूँ
फुलवारी लगाती हूँ
ताकि वह निश्शंक घूम सके
आस्था के वस्त्र पहने
प्रेम के गाँव में !

अनिता निहालानी
९ फरवरी २०११

सोमवार, फ़रवरी 7

सरस्वती पूजा भाती

सरस्वती पूजा भाती

माघ मास के शुक्ल पक्ष की
 तिथी पंचमी जब आती,
खिलते दिगंत, आता वसंत
 सरस्वती पूजा भाती !

विद्या, बुद्धि, ज्ञान, वाणी की
मेधा, प्रज्ञा, धी, स्मृति की,
माँ भारती, हंसवाहिनी
आद्या शक्ति परमेश्वर की !

वीणापाणि, श्वेताम्बरा
कुमुदी, गिरा अनेकों नाम,
भाषा, वाक्, वाग्देवी
बारम्बार तुम्हें प्रणाम!

श्वेत हँस वाहन सुंदर
श्वेत कमल आसन विराजे,
दो हाथों में वाद्य उठाये
वेद, पुष्प शेष में साजे !

अमृतमय, प्रकाश पुंज तुम
कृपा बरसती है प्रतिपल,
शुद्ध प्रेममय, तेजोमय हे  
मन में बसो सदा अविचल !

अनिता निहालानी
७ फरवरी २०११

टूटी विस्मृति मन की

टूटी विस्मृति मन की

ओंउम् की पुकार उठी
हुई जागृत रग-रग तन की
रेशा रेशा लहराया
टूटी विस्मृति मन की !

श्वासों की डोर चली
मन पतंग हो उठा
तोड़ तन के बंधन  
उड़ा किया चिदाकाश में !

लहर उठी श्वासों की
मानस तब हँस हुआ
तिरता रहा अनवरत
भावों के सरवर में !

श्वासों का पट बना
घिस घिस मन चमकाया
झलक उठा चिन्मय
अंतर के दर्पण में !

पुल बना श्वासों का
मानस की धारा पर
चल पड़ा यायावर
अनंत की खोज में !

श्वासों का दीप जला
हुआ उजाला भीतर बाहर
मन माणिक जगमगाया
अकम्पित लौ में !

माल गुंथी श्वासों की
ओंउम् के सुमनों से
थाम चला हाथों में
प्रियतम की खोज में !

श्वासों की बनी समिधा
मन हवन कुंड बना
सत्य तब प्रकट हुआ
ओंउम्.. ओंउम्... ओंउम्....!
 अनिता निहालानी
७ फरवरी २०११  

शनिवार, फ़रवरी 5

पुण्य सम पावन यह प्यार


पुण्य सम पावन यह प्यार

अनसुनी जाने न पाए
मीत की कोई पुकार,
कौन जाने कब मिलेगी
झूमती गाती बहार !

कौन जाने कब खिलेगा
 पुण्य सम पावन यह प्यार !

आँख भर के देख लो
बूंद कितनी देर ठहरी,
सप्तवर्णी अमिय धारे
ज्यों मधुर संगीत लहरी !

हो तिरोहित पूर्व उसके
थाम लो बन जाओ धार !
कौन जाने कब खिलेगा?
 पुण्य सम पावन यह प्यार !

खोजने का तुम जिसे
कर रहे अभिनय युगों से,
पांव रखे हो उसी पे
बँध अदेखी बेड़ियों से !

खोल दृग देखो यदि तुम
जग किये सोलह सिंगार !
कौन जाने कब खिलेगा?
 पुण्य सम पावन यह प्यार !

अनिता निहालानी
५ फरवरी २०११







शुक्रवार, फ़रवरी 4

आया वसंत





आया वसंत

नव वसंत की नई भोर का
तन-मन में जागी हिलोर का
उल्लसित हो करें स्वागत !

नयी प्रीत हो नयी रीत हो
नव ऊर्जा से रचा गीत हो,
नया जोश हो नव उमंग हो
हर दिल में छायी तरंग हो !

मधुमास के नए प्रातः का
नए तराने नयी बात का
हर्षित हो करें स्वागत !

नए इरादे नए कायदे
इस वसंत में नए वायदे,
नए रास्ते नयी मंजिलें
नव ऋतु में नए सिलसिले !

नव बहार की नई सुबह का
नई मित्रता नई सुलह का
प्रफ्फुलित हो करें स्वागत !

अनिता निहालानी
४ फरवरी २०११
 


Posted by Picasa

गुरुवार, फ़रवरी 3

इसलिए कुछ ठंड ज्यादा आज है

Posted by Picasa
इसलिए कुछ ठंड ज्यादा आज है

शीत लहरी है कंपाती हाड़ को
कटकटाते दांत जब पाला पड़े,
शाम से पहले धुंधलका छा गया
सूर्य निकले सर्दियों में दिन चढ़े !

धूप में तेजी नहीं बस कुनमुनी सी
बदलियों से डर गया रविराज है,
रात भर गरजा किये बादल घने
इसलिए कुछ ठंड ज्यादा आज है !

छुपे जन्तु शीत से पाने पनाह
चीटियाँ और छिपकली दिखती नहीं,
फूल बागों में ठिठुरते से खिले
घास भी कुम्हला गयी पीली पड़ी !

ओढ़ मफलर, स्कार्फ, टोपी, शॉल सब
चाय की चुस्की लगाते चल रहे हैं,  
रेवड़ी, तिल, गजक बिकते थोक में
अलाव भी होड़ लेते जल रहे हैं !

अनिता निहालानी
३ फरवरी २०११   

बुधवार, फ़रवरी 2

कुछ इधर की कुछ उधर की

कुछ इधर की कुछ उधर की

लोकतंत्र
लोकतंत्र का हुजूर असल अर्थ है यही
लोग अपने हों यदि, तन्त्र अपना हो गया !

जान पहचान के हैं हजार फायदे
अर्जियां धरी रहीं, यूँ ही काम हो गया !

दे दिला दिया उन्हें चाय-पानी वास्ते
हफ्ते भर से था खराब, फोन ठीक हो गया !

एब्स्ट्रैक्ट आर्ट

निकले जो सर के ऊपर महान है वह रचना
हैरान करके छोड़े, आलीशान है वह रचना !

जो उलटी है या सीधी पहचानना हो मुश्किल
इंसान या गधे की, यह जानना हो मुश्किल !

वह कलाकृति अमर है जो हो परे अकल से
लाखों में वह बिकेगी, टेढ़ी हो जो शकल से !

अनिता निहालानी
२ फरवरी २०११

मंगलवार, फ़रवरी 1

कर्म से कर्मयोग

कर्म से कर्मयोग

चींटी से हाथी तक
राजा से रंक तक,
मूर्ख से विद्वान तक
सभी रत हैं कर्म में !

श्वास लेते, उठते, बैठते
रोते-हँसते, चलते-फिरते,
उंघते, सोते हुए भी
हम कर्म से विमुक्त नहीं !

कुछ पाने की आस लगाते
इधर-उधर दौड़-भाग करते,  
सुख, धन, सम्मान हेतु
जीवन भर खटते हैं !

चाह अंतर में धरे
पूरा होता है जीवन,
तब भी पीछा नहीं छोड़ते
कर्म पुनः संसार में जोतते !

जो बीज बोये थे
उन्हें काटना है,
नए कर्मों की पौध
को छांटना है !

क्लांत मन, थका तन
एक दिन सजग होता है,
ज्ञानदीपक भक से
भीतर जल उठता है !

कर्म तब बांधते नहीं
निष्काम, निस्वार्थ कर्म,
केवल कर्म के लिये कर्म
कर्म तब कर्मयोग कहलाता है !

अनिता निहालानी
१ फरवरी २०११   

सोमवार, जनवरी 31

हँसना मना है !

मुकरियाँ

हर बंधन को बुरा बतावे
अपनी मर्जी ही चलवावे
सांसत में सब आये पालक
क्यों सखी साजन, न सखी बालक !

ठूंस-ठूंस कर चारा खाए
अपनी खिदमत खूब कराए
भूल के भी डकार न लेता
क्यों सखी भैंसा, न सखी नेता !

सारे जग से पूजा जाता
सबके दिल पर धाक जमाता
पड़ें पैर सब दादा- मैया
क्यों सखी देव, नहीं रुपैया !

गली गली में उसके चर्चे
जैसे सबको देने पर्चे
दीवाने नौकर या सेठ
क्यों सखी हीरो, नहीं क्रिकेट !

शैम्पू, साबुन बेचे तेल
माल बेचना समझे खेल
मनमानी कीमत है लेता
क्यों सखी बनिया, न अभिनेता !

अनिता निहालानी
३१ जनवरी २०११