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मंगलवार, नवंबर 14

जलें दीप जगमग हर मग हो


जलें दीप जगमग हर मग हो

पूर्ण हुआ वनवास राम का, 
सँग सीता के लौट रहे हैं
अचरज देख हुआ लक्ष्मण को,
द्वार अवध के नहीं खुले हैं !

अब क्योंकर उत्सव यह होगा,
दीपमालिका नृत्य करेगी,
मंगल बन्दनवार सजेंगे 
रात अमावस की दमकेगी! 

हमने भी तो द्वार दिलों के 
कर दिये बंद डाले ताले,
राम हमारे निर्वासित हैं, 
जब अंतरदीप नहीं बाले !

राम विवेक, प्रीत सीता है, 
दोनों का कोई मोल नहीं
शोर, धुआँ तो नहीं दिवाली, 
जब सच का कोई बोल नहीं !

धूम-धड़ाका, जुआ, तमाशा, 
उत्सव का कब करें सम्मान
पीड़ित वातावरण प्रदूषित  
देव संस्कृति का है अपमान !

जलें दीप जगमग हर मग हो,
अव्यक्त ईश का भान रहे
मधुर भोज, पकवान परोसें, 
मनअंतर में रसधार बहे !

सोमवार, सितंबर 3

ऐसा दीवाना है कान्हा

ऐसा दीवाना है कान्हा 

आँसू बनकर जो बहता है 
मौन रहे पर कुछ कहता है
किसी नाम से उसे पुकारो
उपालम्भ जो सब सहता है ! 

  हो अनजाना कोई उससे 
तब भी वह रग-रग पहचाने
इक दिन तो पथ पर आएगा 
कब तक कोई करे बहाने! 

जब तक उसकी ओर न देखो 
नेह सँदेसे भेजा करता
कभी हँसा कर कभी रुलाकर 
अपनी याद दिलाया करता ! 

ऐसा दीवाना है कान्हा 
प्रीत पाश में ऐसा जकड़े
हाथ छुड़ा तब जाता लगता 
जब कोई खुद से ही झगड़े !

अँधियारी हो रात अमावस 
हीरे मोती सा वह दमके
काली यमुना उफन रही हो 
उजियारा बनकर वह चमके !