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सोमवार, जुलाई 5

जैसे कोई द्वार खुला हो

 जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर सभी दिशा में

बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,

पुलक उठाता होश जगाता

भरता अनुपम जोश निरंतर !


जैसे कोई द्वार खुला हो

आज अमी की वर्षा होती,

आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी

धार सहज ही रहे भिगोती !


रंचमात्र भी भेद नहीं है

जल से जल ज्यों मिल जाता है,

फूट गयीं दीवारें घट की

दौड़ा सागर भर जाता है !


मेघपुंज बन कभी उड़े मन

कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,

पीपल की ऊँची फुनगी पर

खगों के सुर में सुर भर रहा !


कभी दिशाएं हुईं सुवासित

सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,

धूप रेशमी उतरी नभ से

जल कण से तृण कोर निखरता !


तन का पोर-पोर कम्पित है

गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,

उर बौराया चकित हुआ सा

देख-देख नव सपने बुनता !


मंगलवार, दिसंबर 6

जैसे कोई द्वार खुला हो



जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर, सभी दिशा में
बरस रहा वह झर-झर, झर-झर,
पुलक उठाता, होश जगाता
भरता अनुपम जोश निरंतर !

जैसे कोई द्वार खुला हो
आज अमी की वर्षा होती,
आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी
अंतर सहज ही रहे भिगोती !

रंचमात्र भी भेद नहीं है
जल से जल ज्यों मिल जाता है,
फूट गयीं दीवारें घट की
दौड़ा सागर भर जाता है !

मेघपुंज बन कभी उड़े मन
कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
पीपल की ऊँची फुनगी पर
खग के सुर में सुर भर रहा !

कभी दिशाएं हुईं सुवासित
सौरभ सहज चहूँ ओर बिखरता,
धूप रेशमी उतरी नभ से
जल कण से तृण कोर निखरता !

तन का पोर पोर कम्पित है
गुंजन इस ब्रह्मांड की सुनता,
उर बौराया चकित हुआ सा
देख-देख सब सपने बुनता !