जैसे कोई द्वार खुला हो
भीतर-बाहर सभी दिशा में
बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,
पुलक उठाता होश जगाता
भरता अनुपम जोश निरंतर !
जैसे कोई द्वार खुला हो
आज अमी की वर्षा होती,
आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी
धार सहज ही रहे भिगोती !
रंचमात्र भी भेद नहीं है
जल से जल ज्यों मिल जाता है,
फूट गयीं दीवारें घट की
दौड़ा सागर भर जाता है !
मेघपुंज बन कभी उड़े मन
कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
पीपल की ऊँची फुनगी पर
खगों के सुर में सुर भर रहा !
कभी दिशाएं हुईं सुवासित
सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,
धूप रेशमी उतरी नभ से
जल कण से तृण कोर निखरता !
तन का पोर-पोर कम्पित है
गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,
उर बौराया चकित हुआ सा
देख-देख नव सपने बुनता !