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बुधवार, मई 31

जब

जब 

प्रेम एक आशीष सा 

झोली में आ गिरता है 

दिशाएँ गाने लगतीं 

कोहरे में छिपा लाल सूर्य का गोला 

अंकित हो जाता सदा के लिए 

मन के आकाश पर 

वृक्षों के तनों से सटकर बैठते

 ज़मीन की छुअन को 

महसूस करता तन 

फूलों की सुवास 

किसी नशीली गंध की तरह 

भीतर उतर जाती

वर्षा की प्रथम मोटी-मोटी बूदें 

जब पड़तीं सूखी धरा का ताप हरने 

ठहर जातीं कमल के पत्तों पर पारे की तरह 

लटकती डालियों से झूलते 

कभी घास पर लेटकर 

तकते घंटों आकाश को 

एकाकी कहाँ रहता है सफ़र जीवन का 

जो अस्तित्त्व को निज मीत बनाता है 

वृक्षों, फूलों, बादलों को 

नित क़रीब पाता है 

भावना में जीता वह

भावना को पीता है 

मौन में गूंजती हुई 

दिशाओं संग 

गुनगुनाता है 

अचल तन में घटता है नृत्य भीतर

निरख श्यामला धरा 

अंतर लहलहाता है 

उड़ता है हंसों के साथ 

मानसरोवर की पावनता में 

शांति की शिलाओं पर 

थिर हो आसन  जमाता है 

ज्ञान का सूर्य जगमगाता है 

निरभ्र निस्सीम आकाश सा उर 

बन जाता है ! 

 



सोमवार, अप्रैल 5

वर्षा थमी

वर्षा थमी 

पंछी छोड़ नीड़ निज चहकें 
मेह थमा निकले सब घर से, 
सूर्य छिपा जो देख घटाएँ 
चमक रहा पुनः चमचम नभ में !

जगह जगह छोटे चहबच्चे
 फुद्कें पंछी छपकें बच्चे, 
गहराई हरीतिमा भू की
 शीतलतर पवन के झोंके !

पल भर पहले जो था काला 
नभ कैसा नीला हो आया, 
धुला-धुला सब स्वच्छ नहा कर  
कुदरत का मेला हो आया !

 इंद्रधनुष सतरंगी नभ में
 सुंदरता अपूर्व बिखराता,
 दो तत्वों का मेल गगन में 
स्वप्निल इक रचना रच जाता !

जहाँ-जहाँ अटकीं जल बूँदें 
 रवि कर से टकराकर चमकें, 
जैसे नभ में टिमटिम तारे 
पत्तों पर जलकण यूँ दमकें !

 कहीं-कहीं कुछ धूसर बादल 
छितरे नभ में होकर निर्बल,
 आयी थी जो सेना डट के
 रिक्त हो गयी बरस बरस के ! 

पूर्ण तामझाम संग आयी 
काले मेघा गज विशाल हो, 
हो गर्जन तर्जन रणभेरी 
चमके विद्युत तिलक भाल ज्यों !

रविवार, अक्टूबर 4

अस्तित्त्व और हम

 अस्तित्त्व और हम 

एक हवा का झोंका भी आकर 

उसकी खबर दे जाता है 

दूर गगन में उगता हुआ साँझ का तारा 

उसकी याद से भर जाता है 

बादलों में बना कोई आकार

छेड़ जाता है मन की झील को 

डाली पर एक फूल का खिलना 

कैसी मुस्कान अंतर में जगा जाता है 

तेरे मिलने के हजार ढंग हैं !

वर्षा की फुहार बनकर तू ही 

भिगोता है उर का आंगन 

कोयल की कूक में कोई नगमा सुना जाता है 

सूरज की पहली किरण 

छूती है चेहरे को 

लगता है तू ही चुपके से गुलाल लगा जाता है 

झरनों का संगीत या पंछियों का गीत 

ओस की छुवन या घास का परस

देता है तू ही हर रूप में 

हर रंग में हर शै में दरस 

तू ज्योति बनकर दीपक में जलता है 

जिसे देख अंतर में कोई स्वप्न पलता है  

मन भी ज्योति बनकर 

जले तेरी राह में 

कुछ भी न शेष रहे 

शून्य ही बरसे हर चाह में 

अस्तित्त्व के साथ एक हो जाना ही तो पूजा है 

उसके सिवा न साधन कोई दूजा है !


बुधवार, सितंबर 12

प्रतीक्षा


प्रतीक्षा 

नहीं, अब कुछ भी नहीं रुचता
न ही बादलों का शोर
न नाचता हुआ मोर
न वर्षा का बरसता हुआ जल
न झरनों की कलकल
न पंछियों की टीवी टुट् लुभाती है
न ही रुत सावन की भाती है
अब तो उस श्याम की प्रतीक्षा है
जो इन घनघोर घटाओं से भी काला है
जो इन हवाओं से भी मतवाला है !

शुक्रवार, सितंबर 16

आसमान में तिरते बादल

आसमान में तिरते बादल

खुली हवा में शावक बनकर
दौड़ लगाते क्यों न जीयें,
एक बार फिर बन के बच्चे
वर्षा की बूंदों को पीयें !

नाव चलायें पानी में इक
इक्कड़-दुक्कड़ भी खेलें,
आसमान में तिरते बादल
देख-देख हर्षित हो लें !

तोड़ के सारे बंधन झूठे
नजर मिलाएं मुक्त गगन से,
मन को जिन पहरों ने बांधा
उन्हें जला दें प्रीत अगन से !

थोड़े से हों नियम-कायदे
निजता का हो वरण सदा,
मीत बना लें सारे जग को
सीखें शिशु से यही अदा !

शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



गुरुवार, अप्रैल 28

खिले रहें उपवन के उपवन

खिले रहें उपवन के उपवन


रिमझिम वर्षा कू कू कोकिल
मंद पवन सुगंध से बोझिल,
हरे भरे लहराते पादप
फिर क्यों गम से जलता है दिल !

नजर नहीं आता यह आलम
या फिर चितवन ही धूमिल है,
मुस्काने की आदत खोयी
आँसू ही अपना हासिल है !

अहम् फेंकता कितने पासे
खुद ही उनमें उलझा-पुलझा,
कोशिश करता उठ आने की
बंधन स्वयं बाँधा न सुलझा !

बोला करे कोकिला निशदिन
हम तो अपना राग अलापें,
खिले रहें उपवन के उपवन
माथे पर त्योरियां चढ़ा लें !

आखिर हम भी तो कुछ जग में
ऐसे कैसे हार मान लें,
लाख खिलाये जीवन ठोकर
क्यों इसको करतार जान लें !

मंगलवार, सितंबर 2

गंगा बहकर जाये सागर

गंगा बहकर जाये सागर


घोर घटाओं में विद्युत् जब
चमक चमक लहरा कर गाती,
गिरने लगतीं बूंदें तड़ तड़
गर्जन घन की नहीं डराती !

घटाटोप सा छाता नभ पर
खो जाती वह शुभ्र नीलिमा,
दूर कहीं से हंसों की इक
पंक्ति फर से उड़ती जाती !

पवन भीग कर थिर हो जाता
हौले-हौले पात डोलते,
चहबच्चों में भर जाता जल
बूँदें गिर कर वृत्त बनातीं !

कुछ निशब्द घास पर गिरतीं
धातु पर कुछ शोर मचातीं,
ध्वनि अनेक जल धार एक है
हर शै उसकी गाथा गाती !

वृष्टि का क्रम चलता अविरत
धरा लहक लहक मुस्काती,
गंगा बहकर जाये सागर
सागर से ही जल भर लाती !




रविवार, अगस्त 17

वह बात

 वह बात


एक बात जो दिल के करीब है
भिन्न-भिन्न शक्लें इख़्तियार कर लेती है
और घूम-घूम कर आ जाती है
हर बात में शामिल होने
जैसे गायक बार-बार गाता हो
टेक की पंक्ति को
या चित्रकार रचता हो नये-नये चित्र
पर अपनी छोड़े जाता हो हरेक में
या कोई मूर्तिकार झलक जाता हो
उसकी हर मूर्ति में
उसके हर शिल्प में
वह बात चाहे हजार बार कही गयी हो
नई सी लगती है हर बार
जैसे सावन की हर बरसात पहले से अलग होती है
कभी टूट पड़ते हैं बादल
कभी फुहार बनकर धरा का स्पर्श भर करते हैं
कभी तड़-तड़ गिरते हैं संग ओलों के
कभी हवा के संग बस गगन में तिरते हैं
ऐसे ही वह बात है
जो कभी पूरे विश्वास से दोहराई जाती है
कभी इशारा भर होता है उसकी ओर
प्रकटती है कभी आनन्द का गीत बनकर
तो कभी संदेशा लाती है अश्रुओं का
जीवन का प्रतीक ही नहीं
बन जाती है कभी मृत्यु का प्रतीक भी
पूर्णता को प्राप्त नहीं होती
हर बार अधूरी ही रह जाती है
इक बात जो हर बात का आधार है शायद
स्वयं आधारहीन नजर आती है
क्योंकि उसके आते ही लोग इधर-उधर देखने लगते हैं
कभी कोई देखता है घड़ी की ओर
और जम्हाई लेता है कोई
कोई-कोई ही तन्मय हो जाता है
पर उसके चेहरे पर शून्य पसर जाता है
इस वायवीय सी बात पर यकीन करे या नहीं
समझ में नहीं आता
वह बात जो दिल के करीब है....



मंगलवार, अगस्त 12

पढ़ पाते बूंदों की भाषा

पढ़ पाते बूंदों की भाषा



बरसे मेघा भीगा अंतर
कोंपल-कोंपल खिली हृदय की,
टिप-टिप रिमझिम बूंदों के स्वर
सुन लहरायी धड़कन दिल की !

जाने कौन लोक से लाये
मेघ संदेसा उस प्रियतम का,
झूम रहे हैं पादप, तरुवर
पढ़ पाते बूंदों की भाषा !

हैं सुकुमार पुष्प बेला के
सहज मार वारि की सहते,
नभचर छिपे घनी शाखा में
चकित हुए से अम्बर तकते !

दूर हैं जो प्रियजन निज घर से
स्मृति दिलाती झड़ी सुहानी,
शीतल, निर्मल सी इक आभा
पहुंचे उन तक अनकथ वाणी !

धरा उमगती खिलखिल हँसती
पाकर परस नेह का सजती,
खेली जाती एक नाटिका
तृप्त हो रही तृषा युगों की !

शनिवार, मार्च 1

वर्षा को भी मची है जल्दी

वर्षा को भी मची है जल्दी


टिप-टिप बूंदें दूर गगन से
ले आतीं संदेश प्रीत के,
धरा हुलसती हरियाली पा
खिल हँसती ज्यों बोल गीत के !

शिशिर अभी तो गया नहीं है
 रुत वसंत आने को है,
मेघों का क्या काम अभी से
 फागुन माह चढ़ा भर है !

वर्षा को भी मची है जल्दी
उधर फूल खिलने को आतुर,
मोर शीत में खड़े कांपते
 अभी नहीं जगे हैं दादुर !

मानव का ही आमन्त्रण है
उथल-पथल जो मची गगन में,
बेमौसम ही शाक उगाता
बिन मौसम फल-फूल चमन में !


गुरुवार, अगस्त 8

उस दिन

खनकती हुई सी इक याद, जैसे सुबह की धूप
नयनों में भर गया कोई, ज्यों चाँदनी का रूप

उस दिन

अचानक छा गये मेघ काले-धूसर
देखते ही देखते स्याह हो गया अम्बर
गरजने लगा इंद्र सेनापति सा
परचम लहराने लगे पवनदेव झूमकर
धरा उत्सुक थी स्वागत करने को
ऊंचे पर्वत भी घाटियों के दामन फैलाये
थे आतुर अमृत भरने को
पहले इक्का-दुक्का ही झरीं बूँदे
उस दोपहर
बरामदे में बैठ लगी जब वह सुनने
प्रकृति का मृदुल स्वर !
पर क्षणों की ही देर थी
तीव्र हो गया वेग वर्षा का
छप छप छपाक छपाक के सिवा
 न दे कुछ सुनाई, न आता था नजर
बूंदों के पार निहारा जब उसने
 नजर आती थीं बूँदें बस कुछ दूर तक
ऊपर तो था सपाट आकाश
मानो उसे हो ही न कोई खबर
मध्य में ही रचे जाता हो यह दृश्य
कोई अपने जादुई स्पर्श से
वह और बैठ न रह सकी  
प्रकृति के इस आह्लाद में शामिल होने से
वंचित स्वयं को कर न सकी
   हरियाली में नीचे भी जल था
 धाराएँ बरस रही थीं ऊपर से
भिगो रही थीं तन, मन को
 ही नहीं, उसके अन्तस् को
  सुखदायी वह जल का स्पर्श
 धरा की गोद कितनी कोमल
सिमट आया अस्तित्त्व उस क्षण उसकी आँखों में
  रेशा-रेशा सरस हो गया मेह में  
वह भाग बन गयी प्रकृति का
ज्यों पंछी, वृक्ष, लॉन की हरी घास और फूल
उस दिन जाना उसने
थी वह ध्वनि बढ़कर स्वर्गीय संगीत से
छुअन मखमली स्पर्श से !