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बुधवार, जून 7

हे कृष्ण !

हे  कृष्ण !


कितना दुर्लभ है इस जग में 

कोई निर्दोष हास्य 

निष्कपट अंतर 

हे  कृष्ण !  बहुत ऊँचे मापदंड 

नहीं बना दिये है तुमने !

यहाँ तो हर मुस्कान के पीछे

 छिपा है कोई अभिप्राय 

और तुम कहते हो 

हरेक भीतर ऐसा ही है 

कि अधम से अधम भी

 बन सकता है तुम्हारा प्रिय 

जिस क्षण वह मोड़ लेता है 

अपनी दिशा तुम्हारी ओर ! 


शुक्रवार, मई 27

फूल शांति का

फूल शांति का


झुक जाने में ही विश्राम है 

सदा मौन में मिलता राम है 

‘और चाहिए’ की ज़िद छोड़कर 

जो मिला है उसे स्वीकार लें 

विचार सागर की लहरों में 

डूबते हुए मन को, उबार लें 

  भीतर सहज ही किनारा मिलता है 

 फूल शांति का खिलता है 

जो देता है जीवन को दिशा 

उमग आती भीतर अनंत ऊर्जा 

विशेष होने की कोई चाह न रहे  

‘कुछ बनो’ की धारा जब न बहे  

थम जाये भीतर शोर मन का 

 एकांत में उससे मिलन घटे  

जिसकी शरण में है कायनात  

 दे रहा जो हर इक को हयात  ! 




सोमवार, जुलाई 5

जैसे कोई द्वार खुला हो

 जैसे कोई द्वार खुला हो

भीतर-बाहर सभी दिशा में

बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,

पुलक उठाता होश जगाता

भरता अनुपम जोश निरंतर !


जैसे कोई द्वार खुला हो

आज अमी की वर्षा होती,

आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी

धार सहज ही रहे भिगोती !


रंचमात्र भी भेद नहीं है

जल से जल ज्यों मिल जाता है,

फूट गयीं दीवारें घट की

दौड़ा सागर भर जाता है !


मेघपुंज बन कभी उड़े मन

कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,

पीपल की ऊँची फुनगी पर

खगों के सुर में सुर भर रहा !


कभी दिशाएं हुईं सुवासित

सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,

धूप रेशमी उतरी नभ से

जल कण से तृण कोर निखरता !


तन का पोर-पोर कम्पित है

गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,

उर बौराया चकित हुआ सा

देख-देख नव सपने बुनता !


मंगलवार, जून 25

गीत कोई कसमसाता



गीत कोई कसमसाता



नील नभ के पार कोई
मंद स्वर में गुनगुनाता,
रूह की गहराइयों में
गीत कोई कसमसाता !

निर्झरों सा कब बहेगा
संग ख़ुशबू के उड़ेगा,
जंगलों का मौन नीरव
बारिशों की धुन भरेगा !

करवटें ले शब्द जागे
आहटें सुन निकल भागे,
हार आखर का बना जो
बुने किसने राग तागे !

गूँजता है हर दिशा में
भोर निर्मल शुभ निशा में,
टेर देती धेनुओं में
झूमती पछुआ हवा में !

लौटते घर हंस गाते
धार दरिया के सुनाते,
पवन की सरगोशियाँ सुन
पात पादप सरसराते !

गीत है अमरावती का
घाघरा औ' ताप्ती का, 
कंठ कोकिल में छुपा है
प्रीत की इक रागिनी का !


शनिवार, फ़रवरी 16

ऐसा है वह अनंत


ऐसा है वह अनंत

चादर की तरह लपेट लिया है काँधे पर
उसने नीले आकाश को
मस्तक पर चाँद की बिंदी लगाये
धार लिया है सूरज वक्षस्थल पर गलहार में
आकाश गंगाएं उसकी क्रीडा स्थली हैं
सितारों को पहन लिया है कानों में
बादलों में छिपी बूँदें
बन गयी हैं पाजेब पैरों की
दिशाओं को भर लिया है हाथों में
ऐसा है वह अनंत
उसे कोई भी नाम दो
हर रोज उतरता है धरा पर
साथ जागरण के
हर रात झांकता है नींद में !

सोमवार, सितंबर 28

फूल बना हो जैसे बीज

फूल बना हो जैसे बीज



एक ऊर्जा है अनाम जो
खींच रही है अपनी ओर,
पता ठिकाना नहीं है जिसका
दीवाना जिसका मन मोर !

प्रेम उमगता भीतर आता
उसकी कोई खबर न मिलती,
जिसकी तरफ उमड़ती धारा
जरा भी उसकी भनक न मिलती !

हृदय पिघलकर बहता जाता
दिशा नहीं नजर आती है,
‘मैं’ खोया जब बचे ‘वह’ कैसे
उसकी छाया मिट जाती है !

कण-कण में मधु बिखरा जिसका
कैसे एक दिशा में समाए,
पल-पल फिर अमृत बन जाता
मिटकर ही तो उसको पाए !

तृप्त हुआ फिर डोले उर यह
 फूल बना हो जैसे बीज,
मंजिल पर ज्यों राह आ मिली
छूटी डगर-डगर की प्रीत !



मंगलवार, मार्च 10

धरा गा रही ॐ गीत में


धरा गा रही ॐ गीत में



उसका ही संदेश सुनाते
पंछी जाने क्या कह जाते,
प्रीत भरे अपने अंतर में
वारि भरे मेघ घिर जाते !

मूक हुए तरु झुक जाते जब
उन चरणों में फूल चढ़ाते,
हवा जरा हिचकोले देती
झूमझूम कर नृत्य दिखाते !

तिलक लगाता रोज भाल में
रवि भी मुग्ध हुआ प्रीत में,
चन्द्र आरती थाल सजाता
धरा गा रही ॐ गीत में !

कण-कण करता है अभिनन्दन
अनल, अनिल, भू, नीर, गगन
दिशा –दिशा में वही बसा है
पग-पग पर उसके ही चरण !