बुधवार, जून 7
शुक्रवार, मई 27
फूल शांति का
फूल शांति का
झुक जाने में ही विश्राम है
सदा मौन में मिलता राम है
‘और चाहिए’ की ज़िद छोड़कर
जो मिला है उसे स्वीकार लें
विचार सागर की लहरों में
डूबते हुए मन को, उबार लें
भीतर सहज ही किनारा मिलता है
फूल शांति का खिलता है
जो देता है जीवन को दिशा
उमग आती भीतर अनंत ऊर्जा
विशेष होने की कोई चाह न रहे
‘कुछ बनो’ की धारा जब न बहे
थम जाये भीतर शोर मन का
एकांत में उससे मिलन घटे
जिसकी शरण में है कायनात
दे रहा जो हर इक को हयात !
सोमवार, जुलाई 5
जैसे कोई द्वार खुला हो
जैसे कोई द्वार खुला हो
भीतर-बाहर सभी दिशा में
बरस रहा वह झर-झर-झर-झर,
पुलक उठाता होश जगाता
भरता अनुपम जोश निरंतर !
जैसे कोई द्वार खुला हो
आज अमी की वर्षा होती,
आमन्त्रण दे मुक्त गगन भी
धार सहज ही रहे भिगोती !
रंचमात्र भी भेद नहीं है
जल से जल ज्यों मिल जाता है,
फूट गयीं दीवारें घट की
दौड़ा सागर भर जाता है !
मेघपुंज बन कभी उड़े मन
कभी हवा सँग नृत्य कर रहा,
पीपल की ऊँची फुनगी पर
खगों के सुर में सुर भर रहा !
कभी दिशाएं हुईं सुवासित
सुख सौरभ चहुँ ओर बिखरता,
धूप रेशमी उतरी नभ से
जल कण से तृण कोर निखरता !
तन का पोर-पोर कम्पित है
गूँज इस ब्रह्मांड की सुनता,
उर बौराया चकित हुआ सा
देख-देख नव सपने बुनता !
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