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शुक्रवार, जून 3

गीत समर्पण का

 गीत समर्पण का 

हमारी चाहतों में नहीं था प्यार 

कभी लाघें नहीं मंदिरों के द्वार 

दूर से ही देखते रहे 

लोगों का आना-जाना 

अभी तो हमें था अपनी प्रतिमा को सजाना 

जो भी किया खुद के लिए 

औरों का ख़्याल ही नहीं आता था 

अहंकार का पत्थर सम्मुख खड़ा 

हो जाता था 

अपनी सुविधा देखकर की थी किसी की भलाई 

थोड़ा सा दान देते हुए बड़ी सी तस्वीर भी खिंचवाई 

हमारी ख़ुशी हमारी अपनी बढ़ोतरी में नज़र आती 

यह जगत हमारे लिए ही बना है 

जाने कौन सी माया यह बता जाती थी 

पर कहाँ मिली ख़ुशी, क्योंकि

उसमें प्यार की खुशबू नहीं थी

ख़ुशी प्रकाश की तरह सीधी नहीं मिलती 

परावर्तित होकर अपने भीतर खिलती है 

यह राज किसी के सामने खुलता है 

तो वह पहली बार अस्तित्त्व के सामने झुकता है 

उस समर्पण में ही भीतर कोई द्वार खुलता है 

हवा का एक झोंका सा आकर 

सहला जाता है 

तब देने की ललक जगती है ! 


गुरुवार, सितंबर 16

चाह और प्रेम


चाह 


हर चाह नश्वर की होती है 

शाश्वत को नहीं चाहा जा सकता  

वह आधार है चाहने वाले का 

हर याचक आकाश से उपजा है 

और पृथ्वी की याचना करता है 

पृथ्वियां बनती-बिगड़ती हैं 

आकाश सदा एक सा है 

याचक नहीं जानता खुद का स्रोत 

वह अंधकार में टटोलता है 

प्रकाश का नहीं उसे बोध 

पृथ्वी घूम रही है 

इसका भी नहीं प्रबोध ! ​​


प्रेम 


प्रेम की डोर 

जो हमें बांधती है 

एक दूजे से 

टूटने न पाए 

यही आधार है 

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है 

प्रेम की डोर बांधे रहे परिवार 

समाज और राष्ट्रों को 

तभी जीवन का फूल महकता है !

शुक्रवार, अगस्त 6

मौन समर्पण



मौन 


प्रकाश कहा नहीं जाता 

अंधकार की कहे कौन ?

असीम शब्दों में नहीं समाता 

अच्छा है रहें मौन 

 मुखर जब मौन होगा 

सुवास बन खुद बहेगा 

चकित हुआ मन जहाँ 

मधु रस में पगेगा 



समर्पण 


हो समर्पित उर उन्हीं चरणों पे ऐसे 

धूलि जिनकी करे पावन 

बन सके फिर मन यह दर्पण 

 झलक जाए जग यह सारा 

पर छू न पाए एक कण भी 

तैरता इक जल के ऊपर 

हो अछूता कमल जैसे 

हो समर्पित उर किन्हीं कदमों में ऐसे 

मार्ग पाए चल पड़े फिर 

भूलकर सारी व्यथाएँ 

एक ही पथ चुन ले राही 

 कदम फिर उस पर बढ़ा दे  

इक तने पर खड़ा है वट 

अनगिनत शाखाएँ धारे 


बुधवार, मार्च 31

समर्पण की एक बूँद

समर्पण की एक बूँद


मन अंतर में दीप जले 

जब तक इस ज्ञान का कि 

  एक ही आधार है इस संसार का 

कि जीवन उसका उपहार है 

उस क्षण खो जाता अहंकार है 

वरना प्रकाश की आभा की जगह 

धुआँ-धुआँ हो जाता है मन 

कुछ भी स्पष्ट नजर नहीं आता 

चुभता है धुआँ स्वयं की आंखों में 

और जगत धुंधला दिखता है 

जो किसी और के धन पर अभिमान करे 

उसे जगत अज्ञानी कहता है 

फिर जो देन मिली है प्रकृति से 

उस देह का अहंकार !

हमें खोखला कर जाता है 

कुरूप बना जाता है 

स्वयं की प्रभुता स्थापित करने का  

हिरण्यकश्यपु का 

जीता जागता अहंकार ही थी होलिका

प्रह्लाद समर्पण है 

वह सत्य है, होलिका जल जाती है 

रावण जल जाता है जैसे 

अहंकार की आग में 

न जाने कितने परिवार जल रहे हैं 

समर्पण की एक बूँद ही 

शीतलता से भर देती है 

अज्ञान है अहंकार 

समर्पण है आत्मा 

चुनाव हमें करना है !


 

गुरुवार, अक्टूबर 22

निकट है जो सदा अपना

  निकट है जो सदा अपना

है अधूरा हर समर्पण 

कहाँ कुछ  हम  छोड़ पाते, 

प्रेम पाना चाहते पर 

राज उर में भी छुपाते !


 निकट है जो सदा अपना 

खोजते हम दूर नभ में,

चाहतों से दिल भरा यह 

एक उसकी भी दिखाते !


छिपे अपने लक्ष्य कितने 

उन्हें कैसे भूलता मन, 

सिर झुका है द्वार उसके 

स्वप्न निज सुख का सजाते !


शनिवार, जून 10

समर्पण


समर्पण 

झुका चरणों में जब-जब कोई माथ
पाया सर पर सदा कोई अदृश्य हाथ
नयनों से झरते जिस पल अश्रु कृतज्ञता के
हरे हैं भाव सारे उसने अज्ञता के
पाया कुछ अनमोल.. क्या है.. कहा नहीं जाता
ऐसा कोई गीत है जो शब्दों में नहीं समाता
सारा अस्तित्त्व जैसे समा गया हो भीतर
या खो गया मन भी उस महान के अंदर
रहा कौन शेष , लुप्त हुआ कौन.. यह भी रहता अस्पष्ट है
बस भीतर पुलक नहीं कोई कष्ट है
धरा बन जाती अनोखा रंगमंच
खो जाता पल भर को जैसे हर प्रपंच
वृक्ष देते ताल उस नृत्य के साथ
जो भीतर घटता
बदल जाता सब कुछ देखते-देखते
पर कोई नजर ना आता
कैसा अनोखा वह सुमिलन का क्षण
सज उठता अस्तित्त्व का कण-कण
भीतर-बाहर का रहता भेद नहीं कोई
एक अनंत की खुशबू रग-रग में समोई
शमा जली है जब जान जाता कोई यह
बन परवाना जल कर भी बचा ही रहता वह
थोथा उड़ गया तब सार ही शेष
हर श्वास हर क्षण लगता विशेष !

गुरुवार, अगस्त 2

किशोर कुमार खोरेन्द्र की कवितायें- खामोश ख़ामोशी और हम में


किशोर कुमार खोरेन्द्र की कवितायें- खामोश ख़ामोशी और हम में
रायपुर छत्तीसगढ़ के निवासी, स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी किशोर जी की कवितायें प्रेम, प्रकृति, स्मृतियों और समर्पण के ताने-बाने से बुनी गयी हैं. साकार और निराकार के सारे भेद वहाँ समाप्त होते लगते हैं और प्रकृति कब मानवी का रूप धर लेती है, नायिका कब प्रकृति का कोई रूप बन जाती है, देखते ही बनता है. कविताओं का मूल स्वर समर्पण है. कवि स्वयं को नेपथ्य में रखकर अपनी सारी भावनाएँ अस्तित्त्व को समर्पित करता है, इस संकलन में कवि की दस कवितायें हैं.
पहले किशोर जी का परिचय उन्हीं के शब्दों में-
...
तलाश रहे हो जिसे वह मैं ही हूँ
कहती है चाँदनी
कण कण से पहाड़ों तक का
मैं बनी हूँ शुभ्र आवरण
...
मौन के इस जंगल में मैं हूँ अकेला
कभी नदी का जल
कभी सागर का तट
बन जाते हैं मेरे लिये दर्पण .
..
कभी लगता है तन और मन से
परे...अस्तित्त्व मेरा..
वन के एकांत में करता है विचरण

इनकी पहली कविता जिसका शीर्षक है- तुम्हारा स्मरण चिरंतन तथा प्रेम कथा का सारांश अमूर्त प्रेम को व्यक्त करती हैं.

तुम पर लिखी कविता     
कभी नहीं हो पाती है पूरी
न तुम्हारा सौंदर्य का कर पता हूँ सम्पूर्ण वर्णन
...
ध्यान में तल्लीन हो
मैं कर चुका हूँ
तुम्हारी काल्पनिक छवि के सम्मुख
खुद का समर्पण
तुम प्रज्वलित वह ज्योति हो
जिसे मैं शलभ सा कर चुका हूँ
स्वभावतः वरण

प्रेम कथा का सारांश

वियोग ही है
प्रेम कथा का सारांश
....  ...

आइने के भीतर का हो तुम प्रतिबिम्ब
या
जल में उभर आयी
एक हो परछाई
....

बिना किसी पर
न्योछावर हुए
मन को नहीं मिल पता है करार

गूंजती हो मेरे मन के प्रांगण कवि की दूसरी कविता है जिसमें प्रेम की अलौकिक अनुभूति का चित्रण हुआ है

तुमसे मिले बिना
मैं कर लिया करता हूँ
तुमसे काल्पनिक संवाद
मैं तुम्हारे लिये
हूँ एक सुखद अपवाद

..  ..
कभी उद्गम से बहती हुई आती हो
नदी का प्रवाह बन
....
कभी मील का पत्थर सा मेरी
प्रतीक्षा करती सी लगती हो
जीकर
सदियों पुराने एकांत का सूनापन

मंदिर की घंटियों के स्वर सा
गूंजती हो मेरे मन के प्रांगण

अपना सर्वस्व तुम्हें अर्पण  नामक कविता में कवि अस्तित्त्व में घुल कर एक हो जाना चाहता है

मैंने कर दिया है
अपना सर्वस्व तुम्हें अर्पण
मेरे पास अब
न रूप है, न मन
...
मुझे भाने लगे हैं तुम्हारे स्मरणों के पवित्र चरण
पड़ा रहता हूँ वहीं पर
होऊं जैसे-
ढेरों अर्पित सुगन्धित शुष्क सुमन
...
टूट कर मैं पर्वत
तुम नदी में घुल गया
मुझे ढूढने के लिये
बचा नहीं एक भी कण

पता नहीं इसका क्या है कारण कविता में कवि नायिका से उसके मौन का कारण पूछता है

मौनव्रत किया है तुमने धारण
पता नहीं इसका क्या है कारण
प्यार करने के लए
कुछ शब्दों का ही तो
करना पड़ता है उच्चारण

.. ..
...  ..
तुम एक मात्र हो मेरी
परन्तु सच्ची पाठिका
मैं धरती पर पसरा हुआ एक जलाशय
तुम दूर अंबर पर जैसे
स्थित एक हो एक तारिका
  
मौनव्रत किया है तुमने धारण
पता नहीं इसका क्या है कारण

सुन लो मेरा स्पंदन और सौभाग्यशाली हैं वे नामक कविताओं में कवि स्मृतियों में अपना जीवन खोजता है, एक ओर वह नायिका को याद करता है साथ ही याद किया जाना भी चाहता है

तुम्हारा स्मरण
ही है अब मेरा जीवन
तुम्हारी मुस्कराहट की बाहें
घेर लेती हैं मुझे
मधुर लगता है मुझे
उसका काल्पनिक बंधन

तुम हो सुमन
इसलिये तो कर रहा है
मैं मधुप तुम्हरे समक्ष गुंजन
सुन लो मेरा स्पंदन

रहूँ तुम्हारे ख्यालों में
मैं पल हर
समुद्र भी लगे तुम्हें मुझसा
छू ले तुम्हें मेरी उंगलियों सा
उसकी लहर
...
जब लगे मंझधार में
तुम्हें अपना सूनापन
तब ठंडी हवा के झोंके सा मुझे महसूस कर लेना
...
सौभाग्यशाली हैं वे
जिन्हें कोई याद करता है
जीता है सिर्फ जिसके लिये
वह आजीवन
क्रमशः

गुरुवार, जनवरी 12

गीत समर्पण का गाते हैं


गीत समर्पण का गाते हैं

पुलक भरे जब अपने उर में
साँझ ढले झर जाते हैं,
सँग हवा के इक झोंके पर
झूम झूम इठलाते हैं !

मनहर, कोमल, पुष्प धरा पर
गीत समर्पण का गाते हैं !

लय और गति के सँग बंधे
निज कक्षा में रह सिमटे,
जाने किस अनादि काल से
मंद मंद मुस्काते हैं !

चाँद सितारे ऊपर नभ में
गीत समर्पण का गाते हैं !