जंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जंग लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, मार्च 24

इतिहास

इतिहास 

इतिहास दोहराता है स्वयं को बार-बार 
महामारी का दंश झेला है 
 पहले भी, दुनिया ने कई बार
शायद हम ही थे... 
जब अठाहरवीं शताब्दी में प्लेग फैला था 
या उन्नीसवीं शताब्दी में दुर्भिक्ष... 
हम लौटते रहे हैं बार-बार  
किसी वस्तु.. किसी व्यक्ति के आकर्षण में 
या घटनाओं की पुनरावृत्ति हमें भाती है 
तभी हर बार मानवता वही भूल दोहराती है 
आज विज्ञान का युग है 
दुनिया जुड़ी है आपस में 
जैसे पहले कभी नहीं जुड़ी थी 
आज रोग भिन्न है उसके निदान भी 
यह व्यक्तिगत युद्ध नहीं है 
यह सामूहिक लड़ाई है 
जिसमें स्वास्थ्य कर्मी सेनापति 
और हर नागरिक सिपाही है 
जंग जीतकर जब हम आगे बढ़ें 
तो अपने आप से यह प्रण करें 
सुख लेने में नहीं देने में छुपा है 
यहाँ हम सभी का भाग्य जुड़ा है 
कहीं कोई द्वीप नहीं बचा 
सारी दुनिया एक मैदान बन गयी है 
इस देश की हवा उस देश में पहुँच गयी है 
तो सारी सीमाएं मनों की मिटा दें
और बने रहें अपने-अपने घरों में !


रविवार, मार्च 22

हम साथ हैं

हम साथ हैं


हमें मिली है मोहलत 
चन्द दिनों की, चन्द हफ्तों की या चन्द महीनों की 
हम नहीं जानते 
पर हम साथ हैं उनके
जो लड़ रहे हैं जंग 
कोरोना के खिलाफ !

जिन्हें नहीं मिली पूर्व चेतावनी 
जो धकेल दिए गए अनजाने ही 
मृत्यु के मुख में 
या जो सह रहे हैं पीड़ा आज भी 
हम दुआ करते हैं उनके लिए !

वुहान के किसी पशु बाजार से 
किसी निरीह की देह से आया यह वायरस 
एक सूक्ष्म हथियार की तरह 
छुप गया एक मानव देह में 
उसने खबर भी दी अपने होने की 
किया सचेत भी
पर नहीं समझा कोई भी 
उस चेतावनी को 
और... एक से दूसरे  तक 
फैलता गया इसका प्रकोप 
पहले एक शहर से दूसरे शहर 
फिर एक देश से दूर देश 
एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप 
और अब सारा विश्व इसकी चपेट में है
हजारों ने देह त्याग दी 
लाखों सह रहे हैं पीड़ा 
सैकड़ों लगे हैं उन्हें बचाने में और 
करोड़ों भयभीत हैं 
लेकिन साथ हैं !

घरों में बंद वे नहीं बनेंगे 
वाहक वायरस के 
और जब थककर 
एक दिन दम तोड़ देगा 
आखिरी वायरस भी 
उस दिन के इंतजार में 
भारत के लोग कह रहे हैं 
सारे विश्व से 
हम साथ हैं !


बुधवार, जुलाई 24

एक दिन अचानक

एक दिन अचानक


सुना तो था उसने
सबसे प्रेम करो
पर दिल का दरवाजा था कि
खुलता ही नहीं था सबके लिए....
जंग लग गयी सिटकनी में या
जम गयी थी धूल-मिट्टी दरारों में
पर सुनना जारी रहा तो एक दिन अचानक...
टूट गयी दीवारें दरवाजे सहित !
और एक लहर सी दौड़ती आई
जो अवरुद्ध थी भीतर
हरियाली छा गयी मन उपवन में
उठने लगे सुरभि के बगूले
जो सामने आया बच न पाया उसकी गिरफ्त से
श्वास लेना भी तब दे रहा था स्वर्गिक आनन्द
मुस्कुराहट को पसंद आ गया था उसका मुखड़ा
ईश्वर तब संगी साथी बन गया था और वह सहज ही एक ऊर्जा
जिसमें झलक जाती है हल्की सी भी कालिमा
ऐसा श्वेतकमल सा पारदर्शी हो गया था मन उसका
पल भर में सिलवट संवर जाती है ज्यों
ऐसे ही स्वच्छ हो जाता था
फूल की चोट खाकर आहत हुआ हो ज्यों कोई जलाशय
सारी दुनिया अपना विस्तार नजर आने लगी थी
मिट गये थे सारे भेद
छिन्न भिन्न हो जाते हैं ज्यों बादल बरसते ही...
प्रेम तब करना नहीं था

उसने जाना वह प्रेम ही था....