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बुधवार, जनवरी 29

श्रम


श्रम 

लगभग पचास मीटर लंबी 

मोटी हौज़ पाइप लिए 

डालता जाता है 

हर विला के बगीचे में जल 

कहीं कहीं गमलों की क़तारें हैं 

कहीं घास के लॉन और छोटे-बड़े पेड़ 

देता है सहयोग 

घर-घर जा हरियाली जीवित रखने में 

ग्रीष्म और सर्दियों के मौसम में 

बरसात में ज़रूरत नहीं होती अक्सर 

वह सोचती है 

जब भी उसे देखती है 

झुक गये कंधे पर 

लिपटी हुई भारी सी पाइप

 रखे आते 

सुकून से भरा है उसका वृद्ध चेहरा 

सुबह से शाम हो जाती है 

हर लेन में हर घर में 

जाते-जाते उसे 

कभी वह उसे कुछ देती है तो 

मुस्कुरा कर स्वीकारता है और 

हरे कोट की जेब में रख लेता है 

जीवन कितने लोगों के 

श्रम से चलता है ! 


रविवार, मई 8

वसुंधरा


  वसुंधरा 
जल धाराओं के सिंचन से
तृप्त हुई माँ
उलीचती हरियाली
निज अंतर में कुछ न रखती
सभी यहाँ लौटा देती है
गंध, स्वाद, रंग बन मिलती
धरती कई रूप में खिलती !
पुरवाई भी हुई शीतला
जल संस्पर्श हर गया तप्तता
झूमें वृक्ष, डालियाँ थिरकें
विहग विहँसते.. परस पवन का !
अन्तरिक्ष प्रफ्फुलित उर में
मूक, मौन हो सबको धारे
रवि मयूख धेनु बना कर
नील गगन का रूप संवारे !
सृष्टि रंग मंच पर नित ही
खेल नये नित खेले जाते
उसी चेतना के हित हैं ये
उससे ही हैं भेजे जाते !

मंगलवार, जनवरी 14

है सारा विस्तार एक से



है सारा विस्तार एक से

सूरज बनकर दमक रहा है बना चन्द्रिका चमक रहा है, झर झर झरती जल धार बना बन सुवास मृदु गमक रहा है ! हरियाली बन बिखराता सुख भाव रूप में मौन व गरिमा कहाँ अलग धरती अम्बर से है सारा विस्तार एक से ! जल का स्वाद, अन्नका पोषण वह ही लपट आग की नीली, उससे ही जग का आकर्षण वही ज्वाला बनी है पीली ! वह ही भाव, विचार, ज्ञान है वह ही लघु, सबसे प्रधान है, उससे कोई कहाँ विलग है जिससे है वह कहाँ अलग है ! जननी है वह सब जीवों की उससे रूप सभी को मिलता, वही पराशक्ति भी अजर वह नाम जहाँ से पैदा होता ! खुद को खुद की जगे कामना ऐसी माया वह ही रचती, जग का पहिया रहे डोलता ऐसा कुछ आयोजन करती ! थामे हुए नजर है कोई आसपास ही सदा डोलती, ग्रह, नक्षत्र सभी की शोभा एक उसी का राज खोलती !



मंगलवार, अक्टूबर 8

एक पाती दुलियाजान के नाम



एक पाती दुलियाजान के नाम

बरसों पहले एक भीगी शाम  
काली धुली सड़क पर आहिस्ता से कदम रखे
तेल के कुँओं को गंध कहीं दूर थी
पर.. बादलों को गुलाबी करती
आग की लपटें दूर से दिखाई दे रही थीं
 देखा फिर झरता हुआ आसमान देर रात तक
गेस्टहाउस के कमरे की खिड़की से
हरियाली का एक विशाल समुन्दर था सामने
जब अगली सुबह गोल्फ कोर्स तक नजर गयी
उस दिन से आज तक...कोई भोर ऐसी नहीं हुई
जब इस तेल नगरी की सड़कों को
हमारे कदमों ने न नापा हो
फूलों से लदे पेड़ों को न सराहा हो
आकाश पर रंग बिखेरते बादलों को न निहारा हो
गन्धराज की सुवास हो
या शेफाली की मदमस्त करने वाली ख़ुशबू
अमलतास के फूलों की स्वर्णिम झालरें हों
या सुर्ख लाल गुलमोहर से लदे पेड़
बैंगनी अजार हों या गुलाबी कंचन..
कदम्ब की डालियाँ हों या सुंदर उपवन
दुलियाजान की हर बात निराली है
यहाँ की हवा में कोई जादू है शायद
या फिर इसकी फितरत ही मतवाली है
जालोनी क्लब के गलियारे और पुस्तकालय
ऑडीटोरियम या तरणताल..याद आते ही खुल जाता है
भीतर स्मृतियों का एक संसार विशाल
लेडीज क्लब की मीटिंग्स और संगीत के भव्य आयोजन
न जाने कितने कलाकारों के हुए जहाँ दर्शन
विदाई समारोहों में नम हुईं आँखें
जीवन के चौंतीस बरस जहाँ बीते
उस जमीन के जर्रे-जर्रे को सलाम है
यहाँ की हर गली हर कूचे को प्रणाम है !

शुक्रवार, मई 26

शस्य श्यामला मातरम्


शस्य श्यामला मातरम्

लबालब भरे हैं पोखर अमृत जल से
हरियाली का उतरा समुन्दर जैसे
दूर क्षितिज तक फैले गहरे हरे वन 
देख-देख ठंडक उतर जाती भीतर
कदली वन.. बांस के झुरमुट
धान और अरहर के खेत
कीचड़ सने पाँव कई गाते रहे होंगे गीत
सुंदर अरहर की पूलियां
मानो किसी चित्रकार की आकृतियाँ
नील गगन पर श्वेत मेघ की पूनियां
सुपारी के नारंगी फूल महकते 
पोखर में झाँकता गगन
वृक्षों-पादपों के मोहक प्रतिबिम्ब
मानो बालक-बालिकाएं पंक्तिबद्ध

शुक्रवार, अगस्त 5

डूबे हैं आकंठ

डूबे हैं आकंठ

धूसर काले मेघों से आवृत आकाश
निरंतर बरस रहा
जल की हजार धाराओं से
नहा रही हरी-भरी वसुंधरा
वृक्ष, घास, लतर, पादप
तृप्त हुए सभी डूबे हैं आकंठ
नीर के इस आवरण में ढका है दृष्टिपथ
गूँज रही है निरंतर गिरती बौछार की प्रतिध्वनि
निज नीड़ों में सिमटे चुप हैं पंछी
फिर भी बोल उठती है कभी कोकिल
अथवा कोई अन्य पांखी परों को झाड़ता हुआ
ले चुके हैं न जाने कितने कीट जल समाधि
अथवा तो धरा की गोद में उन्हें पनाह हो मिली
घास कुछ और हरी हो गयी है
नभ कुछ और काला
सावन के पहले से ही मौसम
 हुआ है सावन सा मतवाला
असम की हरियाली का यही तो राज है
ऋतुओं की रानी यहाँ वर्षा बेताज है



बुधवार, अगस्त 27

ये जो सामने

ये जो सामने

नीला आकाश दिख रहा है
श्वेत हल्के मेघों से आवृत
जिसमें अभी-अभी एक पंछी तिरता हुआ
निकल गया है
जिसको छूने की होड़ में
बढ़ती चली जाती है
धरा की कोख से उगी हरियाली
ऊंचे वृक्षों की कतारें
रोकती हैं दृष्टि पथ
क्षितिज का
जिसके नीचे मंडरा रही हैं
 तितलियाँ सुमनों पर
ये गवाह है
अनगिनत सृष्टियों का
अथवा तो घट रहा है इसके नीचे
हर युग.. एक साथ.. अभी इस क्षण !
क्यों कि अनंत है आकाश
कालातीत और भविष्य द्रष्टा भी !


बुधवार, जुलाई 24

एक दिन अचानक

एक दिन अचानक


सुना तो था उसने
सबसे प्रेम करो
पर दिल का दरवाजा था कि
खुलता ही नहीं था सबके लिए....
जंग लग गयी सिटकनी में या
जम गयी थी धूल-मिट्टी दरारों में
पर सुनना जारी रहा तो एक दिन अचानक...
टूट गयी दीवारें दरवाजे सहित !
और एक लहर सी दौड़ती आई
जो अवरुद्ध थी भीतर
हरियाली छा गयी मन उपवन में
उठने लगे सुरभि के बगूले
जो सामने आया बच न पाया उसकी गिरफ्त से
श्वास लेना भी तब दे रहा था स्वर्गिक आनन्द
मुस्कुराहट को पसंद आ गया था उसका मुखड़ा
ईश्वर तब संगी साथी बन गया था और वह सहज ही एक ऊर्जा
जिसमें झलक जाती है हल्की सी भी कालिमा
ऐसा श्वेतकमल सा पारदर्शी हो गया था मन उसका
पल भर में सिलवट संवर जाती है ज्यों
ऐसे ही स्वच्छ हो जाता था
फूल की चोट खाकर आहत हुआ हो ज्यों कोई जलाशय
सारी दुनिया अपना विस्तार नजर आने लगी थी
मिट गये थे सारे भेद
छिन्न भिन्न हो जाते हैं ज्यों बादल बरसते ही...
प्रेम तब करना नहीं था

उसने जाना वह प्रेम ही था.... 

गुरुवार, जनवरी 19

जो घर खाली दिख जाता है


जो घर खाली दिख जाता है


एक-एक कर चुन डाले हैं
पथ के सारे पत्थर उसने,
कंटक चुन-चुन फूल उगाये
हरियाली दी पथ पर उसने !

ऊपर-ऊपर यूँ लगता है
पर भीतर यह राज छिपा है,
वह खुद ही आने वाला है
उसी हेतु यह जतन किया है !

जिस दिल को चुनता घर अपना
उसे सँवारे  सदा प्रेम से,
जो घर खाली दिख जाता है
डेरा डाले वहीं प्रेम से !

उसकी है हर रीत निराली
बड़ा अनोखा वह प्रियतम है,
एक नयन में देता आँसू
दूजे में भरता शबनम है !

वह जो है बस वह ही जाने
हम तो दूर खड़े तकते हैं,
वही पुलक भरता अंगों में
होकर भी हम कब होते हैं !