एक शब्दों का गलीचा
गुनगुनाहट, चहचहाहट, मुस्कुराहट चाहिए
हो मगर खालिस न कोई भी बनावट चाहिए !
इक सलीका जिंदगी में इक तरावट चाहिए
हो तमस कितना घना बस एक आहट चाहिए !
लघु सा छिड़काव जल का पांखुरी से करे पावन
एक हाला रौशनी का एक दीवट चाहिए !
बिना माँगे ही बरसती नेमतों की बदलियाँ
बस यहाँ सारे जहां से इक लगावट चाहिए
ज्यों तरंगें उठ रहीं हल्के पवन के स्पर्श से
कृत्य की बस चेतना में छटपटाहट चाहिए
खिल रहे ज्यों कमल सरवर पंक में भी मुस्कुरा
मन को वैसा ही जुनूं वैसी कसावट चाहिए !
हो विरोधी या समर्थक ऊर्जा ही बांटते
सफर चलता ही रहे न कोई रुकावट चाहिए !
फूल-कांटे संग ही शोभित जहां में हो रहे
पंछियों को गीत सुनने हित बुलाहट चहिये !
शाप या वरदान दोनों मील के पत्थर ही हैं
मंजिलों से पूर्व न कोई थकावट चाहिए !
एक शब्दों का गलीचा चैन से दिल सो सके
प्यार के ताने-बाने में इक बुनावट चाहिए !
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