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मंगलवार, सितंबर 27

माया

 माया 

निर्विकल्प होकर ही 

मिला जा सकता है उससे 

जिसे अज्ञानी मिल सकते हैं 

पर जानने का अभिमान रखने वाले नहीं 

जो  बचाए रखता है खुद को

बार-बार दुःख पाता है 

मिलन के उस छोटे से पल में 

मौन का निर्णय भी हमारा नहीं होता 

अस्तित्त्व ही कराता है 

वह तब बरसता है 

जब उसको बरसना है 

हमें बस तैयार रहना है 

उसकी शरण में आना है 

और जहाँ अहंता ही शेष न हो 

तो ममता कैसे टिकेगी 

कैसे बचेगा मोह और आसक्ति 

वह इतना सूक्ष्म है कि वहाँ कुछ ठहर नहीं सकता 

माया में लोटपोट होना हमने ही तय किया 

तो यह हमारा निर्णय हो सकता है 

पर मायापति स्वयं वरण करता है 

जब जानने और होने के मध्य कोई अंतराल नहीं होता 

जो खोया है अब भी विचारों  के जंगल में 

उसने चुना है माया को !