उर दर्पण में उसको देखा
उर दर्पण में ‘उसको’ देखा
‘उसको’ यानि स्वयं को देखा,
आश्वस्ति की लहर छू गयी
जब-जब भीतर जाकर देखा !
पहले-पहले गहन बवंडर
झंझावात बहुत उठेंगे,
अनजाने रस्तों पर मन के
बीहड़ कंटक पाहन होंगे !
लेकिन दूर कहीं से कोई
झरने की कल-कल भी आती,
कभी किसी पंछी की कुह-कुह
मधुरिम कोई प्यास जगाती !
निकट कहीं ही वह बसता है
श्रद्धा दीप न बुझने पाए,
बढ़ता रहे निरन्तर राही
मंजिल इक दिन सम्मुख आए !
एक झलक जो भी पा लेता
जग में नहीं अजनबी रहता,
पर्वत नदिया बादल उपवन
सबसे दिल का नाता बनता !
कुदरत से संघर्ष नहीं हो
मानव उसका एक अंश है,
माँ से दूर गया हो बालक
चुभता उर में सदा दंश है !
अवसर एक हाथ आया है
अंबर से हम नाता जोड़ें,
धरती पर जब पाँव धरें तो
माँ कहकर ही नमन भी करें !
