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सोमवार, जून 22

दिन-एक उपहार


दिन-एक उपहार  

 मिला है 

उपहार की तरह 

दिन आज का

लिपटा हुआ 

एक चमकीले आवरण में 

हम मुग्ध हैं उसी पर 

खोलना नहीं चाहते 

रख देते हैं आलमारी में 

रंगीन पैकेट्स में बंद 

पड़े हैं जहाँ कई 

अनखुले उपहार पहले के 

यदि खोल दिया होता 

एक नया दिन उपहार की तरह 

जाने क्या निकला होता 

भर देता उल्लास से

 हमारे अंतर को 

या किसी और के 

अगर थमा देते उसे ही 

स्वयं के लिए कुछ करें या औरों के 

बात तो एक ही है 

यहाँ सभी जुड़े हैं भीतर से 

ग्रह अलग-अलग हों ब्रह्मांड में

 आकाश तो एक ही है !


सोमवार, दिसंबर 14

कोई नानक ध्यान लगाता

 कोई नानक ध्यान लगाता 

हम भीतर से अनभिज्ञ सदा 
बस बाहर-बाहर जीते हैं, 
अंतर पटल उलझने देते 
तन हित पट रेशम सीते हैं !

जब बाहर थे अम्बार लगे 
अतुलित दौलत धन वैभव के, 
भीतर कुछ घटता जाता था 
जिसको ना इसमें सार लगे !

जब इर्द-गिर्द सीमाएं रच 
रिश्तों को उनमें कैद किया, 
कुछ टूट गया था भीतर भी 
जब जीवन पर सन्देह किया !

उर डरा कभी सिर भी थामा
तन ने कितने सन्देश दिए, 
मुस्कान कहाँ वह भीतर की 
ऊपर-ऊपर लब  हँसा किये !

मस्तिष्क के तंतु रोते हैं 
धड़कन दिल की जब बढ़ जाये, 
कम्पन अंगों में होता है
हम लेकिन देख कहाँ पाए !

भीतर की रग-रग से वाकिफ 
कोई नानक ध्यान लगाता, 
इक-इक रेशे को पोषित कर 
बाहर भी सुख-चैन लुटाता ! 

 

बुधवार, अक्टूबर 9

तृप्ति भीतर ही पलती


तृप्ति भीतर ही पलती



एक यात्रा बाहर की है
एक यात्रा भीतर चलती,
बाहर सीमा राहों की है
अंतर में असीमता मिलती !

बाहर प्रायोजित है सब कुछ
 भीतर सहज घटे जाता है,
एक थकन ही शेष है बाहर
 गहन शांति भीतर घटती !

भ्रम ही बाहर आस बंधाता
 निष्पत्ति में खाली हाथ,
निज घर में पहुंचाती सबको
 कलिका मन की जब भी खिलती !

 अंतहीन हैं चाहें मन की
पूर्ण हुई इक दूजी हाजिर,
 भीतर जाकर ही जाना यह
तृप्ति भीतर ही पलती !