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सोमवार, मार्च 16

जहाँ खुला आकाश मात्र था

जहाँ खुला आकाश मात्र था 


भ्रम के कितने सर्प पल रहे 

मानव को ख़ुद ही डसते हैं, 

 लगती होड़ सुपर होने की 

अहंकारी मुल्क भिड़ते हैं !


जहाँ खुला आकाश मात्र था 

मानव ने दीवारें गढ़ लीं, 

सीमाओं में बाँधा मन को 

जहाँ प्रेम था, हिंसा पढ़ ली ! 


पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !


जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 


मंगलवार, जुलाई 22

सत्य और भ्रम

सत्य और भ्रम 


माना कदम-कदम पर बाधायें हैं 

मोटी-मोटी रस्सियों से अवरुद्ध है पथ

आसक्ति के जालों में क़ैद 

मन आदमी का 

न जाने कितने भयों से है ग्रस्त  

 जो प्रकट हो जाते हैं स्वप्नों में 

ज्ञान की तलवार से काटना होगा 

रस्सी कितनी भी मोटी हो 

एक भ्रम है 

सत्य सूर्य सा चमक रहा है 

समाधि के क्षणों में 

उसे मन में उतारना होगा 

हर भय से मुक्ति पाकर ?

नहीं, सत्य में जागकर 

स्वयं को पाना होगा !


गुरुवार, जनवरी 23

साधना

साधना 


वह, जो है 

वह, जो अनाम है 


पाया जा सकता है 

उसका पता, उससे

 वह, जो नहीं है 


जो नहीं है 

पर होने का भ्रम जगाता है 


स्वीकार कर लेता है जब 

न होने को अपने 

तब झलक जाता है वह, जो है 


और तब जो नहीं है 

बन जाता है वह जो है 


कुछ नहीं से 

सब कुछ बन जाना ही 

साधना है  


देह व मन को भी 

यही भेद जानना है 


कि वे नहीं हैं अपने आप में कुछ 

और तब वे जुड़ जाते हैं विराट से 


एक विशाल मन ही 

चलाता है सारे मनों को 


पंचभूत चलाते हैं 

सारी देहों को ! 


रविवार, सितंबर 18

जैसे कोई घर लौटा हो

जैसे कोई घर लौटा हो


जगत पराया सा लगता था 

जब थी तुझसे पहचान नहीं, 

तेरी आँखों को पहचाना 

 सबमें  झांक रहा था तू ही !


अब कहाँ कोई है दूसरा 

जैसे कोई घर लौटा हो, 

कतरे-कतरे से वाक़िफ़ है 

जिसने अपना मन देखा हो !


जीवन का प्रसाद पाएगा 

आज यहीं इस पल में जी ले, 

दिल की धड़कन में जो गूँजे 

गीत बनाकर उसको पी ले ! 


शावक के नयनों से झाँके 

फूलों के नीरव झुरमुट में, 

तारों की टिमटिम जिससे है 

भ्रम के उस अनुपम संपुट से !


एक वही तो सदा पुकारे 

प्रेम लुटाकर पोषित करता, 

रग-रग से वाक़िफ़ है सबकी 

अनजाना सा बन कर रहता !


बुधवार, अक्टूबर 13

अहंकार छाया है

अहंकार छाया है


इच्छा जब सिमट गयी  

 खुद का भान हुआ,  

 करने की फ़ांस मिटी 

दीप जल ध्यान का !


वहीं समाधान मिला 

जीवन सवाल का, 

स्वयं की ही खोज थी 

बेबूझ बात का !


अधरों पर स्मित जागा 

अंतर  चैन बहा, 

किस भ्रम में खोया मन 

क्यों यह खेल सहा !


मन ही तो माया है 

राज यह खुल गया, 

अहंकार छाया है 

भय का सबब मिटा !


मंगलवार, अगस्त 24

थिर शांत झील में

थिर शांत झील में 


दूर कहीं जाना नहीं 

निज गाँव आना है 

संसृति को निहारा 

ध्यान अब जगाना है 

खुद को बचाया सदा 

जीवन के खेल में 

भेद सभी खुल गये  

खुद को मिटाना है 

भोर सदा से जहाँ 

मधू ऋतु खिली रहे 

भावों के लोक से 

गुजर वहाँ जाना है 

भ्रम की दीवार गिरे 

पुनः आर-पार दिखे 

सधे होश कदम उठे 

राग मिलन गाना है 

युगों युग बीत गए 

चक्रव्यूह में घिरे 

तोड़ हर राग-द्वेष 

पाना ठिकाना है 

रहा सदा से वहीँ 

सूत भर हिला नहीं 

थिर शांत झील में 

चाँद को समाना है 

दूर नहीं जाना कहीं

निज गाँव आना है 


 

बुधवार, जनवरी 4

नींद और जागरण

नींद और जागरण 


खुद का पता भी अक्सर गैरों से पूछते हैं
जाहिर सी बात है कि अब तक भटक रहे  हैं 

ऊँगली जरा दिखायी मुरझाया दिल कमल 
खिल जाये कैसे फिर से तरकीब पूछते हैं 

सपने सजाये रहते दिल की पनाहगाह में 
सच दूसरे करेंगे भ्रम ऐसे पालते हैं 

अपनी खबर नहीं है जग का हिसाब रखते
इक नींद ले रहे हैं लगता है जागते हैं 

मंगलवार, अगस्त 5

उर उसी पी को पुकारे

उर उसी पी को पुकारे


झिलमिलाते से सितारे
झील के जल में निहारें,
रात की निस्तब्धता में
उर उसी पी को पुकारे !

थिर जल में कीट कोई
खलबली मचा गया है,
झूमती सी डाल ऊपर
कोई खग हिला गया है !

दूर कोई दीप जलता
राह देखे जो पथिक की,
कूक जाती पक्षिणी फिर
नींद खुलती बस क्षणिक सी !

स्वप्न ले जगत सारा
रात्रि भ्रम जाल डाले,
कालिमा के आवरण में
कृत्य कितने ही निभा ले !

बुधवार, अक्टूबर 9

तृप्ति भीतर ही पलती


तृप्ति भीतर ही पलती



एक यात्रा बाहर की है
एक यात्रा भीतर चलती,
बाहर सीमा राहों की है
अंतर में असीमता मिलती !

बाहर प्रायोजित है सब कुछ
 भीतर सहज घटे जाता है,
एक थकन ही शेष है बाहर
 गहन शांति भीतर घटती !

भ्रम ही बाहर आस बंधाता
 निष्पत्ति में खाली हाथ,
निज घर में पहुंचाती सबको
 कलिका मन की जब भी खिलती !

 अंतहीन हैं चाहें मन की
पूर्ण हुई इक दूजी हाजिर,
 भीतर जाकर ही जाना यह
तृप्ति भीतर ही पलती !

बुधवार, सितंबर 12

एक अजूबा है यह दुनिया


एक अजूबा है यह दुनिया


फूलों के हार भी मिलते हैं यहाँ
बैठाया जाता है ऊँचे सिंहासनों पर
फ़ैल जाता है भीतर कुछ...
और एक मुस्कान भर जाती है
पोर–पोर में
अभी चेहरे से उसकी चमक गयी भी नहीं होती
अभी तक उफान शांत हुआ भी नहीं होता भीतर का
कि उतरने का क्षण भी आ जाता है आसन से
फिर छा जाते हैं सिकुड़न, उदासी और भारीपन के बादल
मन के आकाश पर
यूँ कभी सागर की लहरों में आये ज्वार सा मन
छूने लगता है आकाश की ऊँचाइयों को जब
टूट जाता है भ्रम
और जमीनी सच्चाई से पड़ता है पाला

पर.. न सम्मान टिकता है न अपमान...
न जाने कितनी बार यह खेल दोहराया गया है
कितनी ही बार बेगानों व अपनों से मन चोट खाया है
जान लेता है जो 
वह पार हो जाता है
जिंदगी नाम के इस खेल से
जहां जीतो या हारो
अंत में हाथ खाली ही रह जाते हैं
व्यर्थ हो जाते हैं ऊर्जा और समय
देख ले जाग के जो इस सत्य को  
जिसका सम्मान  हुआ वह मैं नहीं था
जिसका अपमान हुआ वह भी नही
सम्मानित किया जिसने यह सोच थी उनकी
अपमान करने वाले की भी अपनी थी मर्जी
उनके मन को भला मैं कैसे जानूँ
जब अपना ही मन न पहचानूँ
कि मेरा होना नहीं टिका है
इन छोटे छोटे सुखों-दुखों पर
जो दूसरे मेहरबानी से मुझपर लुटाते हैं
यह तो कोई और ही बात है
जिस तक पहुंच न सकती कोई आँच  है
जहां न दिन होता न होती रात है
वह एक सा भीतर कोई मैं जाग रहा हूँ
फिर क्यों कुछ पाने बाहर भाग रहा हूँ
बाहर तो लुटाना है
अपनी ऊर्जा अपने ज्ञान का झरना बहाना है
सोचते ही मुस्कान खिल जाती है लबों पर
अखंड आन-शान-बान मिल जाती है भीतर
जो नहीं मुरझाती या खिलती
किसी के सम्मान या अपमान से
दोनों खेल हैं खुद तक ले जाने के लिए
खुद से मिलकर खुद को लुटाने के लिए..