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सोमवार, जुलाई 14

सत्य

सत्य 


सत्य है 

अखंड, एकरस

जानने वाला 

जान रहा प्रतिपल 

 नहीं है भूत या भविष्य 

उसके लिए 

वहाँ कोई भेद नहीं 

न दिशाओं का 

न गुणों का 

भावातीत, कालातीत व देशातीत  

वह बस अपने आप में स्थित है 

वह एक ही आधार है 

पर वह सदा अबदल है 

अभेद्य, अच्छेद्य 

उसमें सब प्रतीति होती है 

पर है कुछ नहीं 

दिखता है यह द्वन्द्वों का जगत 

यहाँ कुछ भी नहीं टिकता 

जबकि उस एक का 

 कुछ भी नहीं घटता ! 





शुक्रवार, मई 24

अतीत

अतीत 


बातों बातों में   

छू जाती है जब 

अतीत की कोई बात

मन पीछे हट जाता है तत्क्षण चौंक कर  

अतीत उस पर हावी है 

क्योंकि अधूरा रह गया है  कुछ

जो पूरा होना चाहता है। 

 दबा  है भीतर 

अभिव्यक्त होना चाहता है। 

  नहीं प्रकटेगा जब तक 

 आसपास मंडराता रहेगा भूत की तरह

हजार-हजार तरीकों से चौंकाता रहेगा 

कभी-कभी मन में धूल उठती है 

स्मृतियों, भावनाओं, अनुभवों और आघातों की धूल 

जिनके ज़ख़्म अभी भरे नहीं  हैं।

मन  बस उन्हें भूल गया है

क्योंकि वह भूलना चाहता है। 

दूर धकेलता है  उन घावों को

लेकिन वे वहीं बने रहते हैं 

कभी भर नहीं पाते 

जब तक बाहर लाकर 

उन्हें सहला न दे

आँख भर के देख न ले 

स्वीकारे उन्हें, जैसे कोई स्वीकारता है

 प्रियजन की भूलों को 

तब अतीत घुल जायेगा वर्तमान में !


मंगलवार, जून 11

मन से कुछ बातें



मन से कुछ बातें


कितने दिन और यहाँ घूमोगे, गाओगे
भटके हो बार-बार कब तक झुठलाओगे ?
 एक न एक.. दिन घर तो आओगे !

स्वाद लिए, रूप देखे, सुर, सुवास में रमे
कदम थके भले यहाँ, पल भर भी नहीं थमे
कितने ठिकानों से दूर किये जाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

कौन सुने बात किसकी बंद कर्ण खुले मुख
तोड़ दिया किसी ने यह शीशाए जिगर फिर
गीत यही आखिर कब तक दोहराओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

भूत जान पर लगा है भय भी अनजान का
जब तब सताएगा ही सरस ख्वाब मान का
पहरे कहाँ तब सोच पर  लगा पाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !