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सोमवार, जुलाई 14

सत्य

सत्य 


सत्य है 

अखंड, एकरस

जानने वाला 

जान रहा प्रतिपल 

 नहीं है भूत या भविष्य 

उसके लिए 

वहाँ कोई भेद नहीं 

न दिशाओं का 

न गुणों का 

भावातीत, कालातीत व देशातीत  

वह बस अपने आप में स्थित है 

वह एक ही आधार है 

पर वह सदा अबदल है 

अभेद्य, अच्छेद्य 

उसमें सब प्रतीति होती है 

पर है कुछ नहीं 

दिखता है यह द्वन्द्वों का जगत 

यहाँ कुछ भी नहीं टिकता 

जबकि उस एक का 

 कुछ भी नहीं घटता ! 





शुक्रवार, अगस्त 18

वर्तमान भविष्य के हाथों में

वर्तमान भविष्य के हाथों में

नवजात शिशु की पकड़ भी 

कितनी मज़बूत है 

मुट्ठी में अंगुली थमाकर देखती है माँ   

 जकड़ लेता है 

दृढ़ता से

मुस्कान थिर है 

नींद में भी उसकी

माँ को लगता है 

जैसे वर्तमान ने 

भविष्य के हाथों में 

स्वयं को सौंप दिया हो ! 


मंगलवार, अगस्त 18

स्वप्न से जागरण तक

 स्वप्न से जागरण तक 

 

स्वप्न अचेतन गढ़ता है 

 है वह आँख जिससे 

झाँका जा सकता है भविष्य में 

वह दर्पण भी, जिसमें, अनजाना रह गया 

खुद से ही 

मन का वह कोना झलकता है !

स्वप्न कहते हैं हमारी अनकही गाथाएं 

भूली-बिसरी पुरातन कथाएं

जिनकी खुटियाँ अब भी गड़ी हैं 

मन के उस अंधकार में  

जहाँ हम जाते नहीं 

जा सकते नहीं 

या जाना चाहते नहीं 

स्वप्न में उभर आती हैं विवशताएँ 

जिन्हें दूर नहीं कर पाया मन 

वे आशाएं, नहीं कर पाया जिन्हें पूर्ण 

स्वप्न को स्वप्न कहकर भूल जाता 

फिर अगली रात वही प्रपंच रचाता 

स्वप्न में ही जागना होगा 

अन्यथा अतीत से सदा भागना होगा 

स्वप्नों के पार ही खुद से मुलाकात होगी 

फिर स्वयं से स्वयं की कुछ बात होगी ! 

 


सोमवार, दिसंबर 2

मन से अमन तक

मन से अमन तक 



हर श्वास वर्तमान में घटती है 
हर वचन वर्तमान में बोला जाता है 
हर भाव वर्तमान में जगता है 
हर फूल वर्तमान में खिलता है 
हर भूख वर्तमान में लगती है 
हर गलती वर्तमान में ही हो रही होती है 
सब कुछ घटा है और घट रहा है वर्तमान में 
तो मन क्यों नहीं रहता वर्तमान में 
कभी बीते हुए कल को ले आता है 
कभी भविष्य को लेकर डरता है 
यूँही तिल का ताड़ बनाकर 
कल्पनाओं में घरौंदे बनाता-बिगाड़ता है 
मन जिसे कहते हैं 
वह भूत और भावी की परछाई है 
भूत जो कभी वर्तमान था 
भावी जो कभी वर्तमान बनेगा 
मन एक प्रतिबिम्ब है 
छाया मात्र.. 
और उसी से चलता है जीवन 
ऐसा जीवन भी एक भ्रम के अतिरिक्त भला क्या होगा 
मन सदा पुराने को ढोता है 
भविष्य को भी अतीत के चश्मे से देखता है 
वास्तविक जीवन इसी क्षण में है 
जब अस्तित्व मौजूद है पूर्ण रूप से 
जिसे ढाल सकते हैं नए-नए रूपों में 
वर्तमान सदा नया है 
हर पल अछूता, प्रेम पूर्ण  
हर पल असीम और अनंत !

गुरुवार, मार्च 9

एक दिन



एक दिन


एक दिन आएगा  
जब सही अर्थों में समान होंगे हम 
परमात्मा की ज्योति से दीप्त 
मनु और शतरूपा की भांति 
एक समान आवश्यक 
उसे जन्माने में 
पंछी के दो परों की भांति 
जीवन के हर द्वंद्व की भांति 
अपरिहार्य एक से 
नहीं होगी कोई प्रतिद्वंद्वता 
न कोई स्पर्धा 
न कोई छोटा और बड़ा 
जीवन के पथ पर संग-संग कदम बढ़ाते 
दो मित्रों की भांति हम लिखेंगे 
भविष्य की नई पीढ़ियों का भाग्य 
निज संस्कारों से पोषित करेंगे 
उनकी अछूती कोमल निष्पाप आत्माएं 
एक दिन आयेगा 
जब हम पुनः मिलेंगे 
समान स्तर पर 
न कोई अनुगामी होगा 
न पीछे चलेगा छाया बनकर 
साथ-साथ होकर भी हम 
नहीं खोएंगे अपनी अस्मिताएं 
सृजन करेंगे मूल्यों और दीर्घकालिक परंपराओं का  
जो कभी गीत और कभी नृत्य बनकर 
जीवित रखेंगी हमारी स्मृतियों को ! 

गुरुवार, अगस्त 23

कवयित्री राजेश कुमारी का काव्य संसार- खामोश ख़ामोशी और हम


   
मुज्जफरनगर, उत्तरप्रदेश में जन्मी राजेश कुमारी जी, जियो और जीने दो.. में विश्वास रखती हैं. संगीत व चित्रकला में भी इनकी रूचि है. अतीत से सीख लेकर वर्तमान को सुधारतीं और भविष्य की ओर सजगता से कदम बढ़ातीं हैं. खामोश ख़ामोशी और हम में इनकी छह कवितायें हैं, सभी विविध विषयों पर लिखी हुईं. किसी में प्रेम की असीमता का वर्णन है जैसे, प्रिये हम कितनी दूर निकल आये, जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया में जीवन की कटु सच्चाई का, भ्रूण हत्या का विरोध करती एक कविता है मुझको दुनिया में आने दो और बालिका शिक्षण को बढ़ावा देती देखो शिखर सम खड़ा हुआ, परमात्मा की कृपा का बखान करती मृग तृष्णा और जीवन का लेखाजोखा लेती जीवन आख्याति....

ना अब कुंठाओं के घेरे हैं
ना मायूसियों के साये
मैं पदचाप सुनूं तेरी
तू पदचाप सुने मेरी
...
बाँहों में बाहें थाम प्रिये
हम कितनी दूर निकल आये
देखो क्या मंजर है प्रिये
नभ धरा का मस्तक चूम रहा
तिलस्मी हो गयी दिशाएं
नशे में तृण तृण झूम रहा
रजनी हौले से आ रही
तारों भरा आंचल फैलाये
बाँहों में बाहें थाम प्रिये
हम कितनी दूर निकल आये
..
चल हाथ पकड़ मेरा प्रिये
अब अपने पथ पर बढ़ जाएँ
मैं पदचाप सुनूं तेरी
तू पदचाप सुने मेरी

समाज में कितने बच्चे और बच्चियां समय से पहले बड़े हो जाने को मजबूर हैं, बाल मजदूरी करने को विवश बच्चे अपना बचपन जी भी नहीं पाते कि समाज उनके हाथों में औजार पकड़ा देता है...

निष्ठुर हाथों ने बचपन छुड़ाया
जमाने की ठोकर ने चलना सिखाया
अभी खिसकना सीखा था
वक्त ने कैसे बड़ा किया
...
कुछ समाज की दोहरी चालों ने
कुछ दोगली फितरत वालों ने
समय से पहले बड़ा किया
अभी खिसकना सीखा था
वक्त ने कैसे बड़ा किया

बालिका भ्रूण हत्या आज समाज की ज्वलंत समस्या है, भारत के कितने ही राज्यों में लिंग का अनुपात विषम हो गया है. कवयित्री इस पर कलम उठाती है-

मैं तेरी धरा का बीज हूँ माँ
मुझको पौधा बन जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमें ऐसा
मुझको दुनिया में आने दो

...
जंगल उपवन खलिहानों में
हर नस्ल के पुष्प महकते हैं
स्वछन्द परिंदों के नीड़ों में
दोनों ही लिंग चहकते हैं

प्रकृति के इस समन्वय का
उच्छेदन मत हो जाने दो
नहीं खोट कोई मुझमें ऐसा
मुझको दुनिया में आने दो

...
नारी अस्तित्त्व के कंटक का
मूलोच्छेदन करना होगा
तेरे दूध पर मेरा भी हक है
दुनिया को ये समझाने दो

अगली कविता कवयित्री ने उन माता-पिता के नाम की है जिन्होंने सर्वप्रथम बालिका शिक्षण की शुरुआत की.

देखो शिखर सम खड़ा हुआ
सकुचाया सा डरा डरा
..
जाने कब हो जाये हनन
सघन तरु की छाया में
इक नन्हा पौधा खड़ा हुआ
..
बीते कितने पतझड़ बसंत
हुआ कद उसका और बुलंद
...
अरि आलोचक मूक बनाये
अपने दम पर खड़ा हुआ
..
कहाँ भीरुता दुर्बल तन
अब बन गया वो तरु सघन
मेरी धरोहर मेरा वंश
उसके ही दम से चला हुआ

मृग तृष्णा शीर्षक कविता अपनी विषय वस्तु और सहज प्रवाह के कारण सीधा हृदय में प्रवेश करती है
मृग तृष्णा में लिप्त
अनवरत गति से भागते हुए
जब थक कर चूर होकर
मायूसी के मरुस्थल में लेट जाती हूँ
..
पूछती हूँ प्यासी हूँ कहाँ जाऊँ
उसने हथेली पे मेरी
एक जल की बूंद गिरा दी
अगर तू है
तो तुझे सुनना चाहती हूँ
उसने बादलों की गर्जना सुना दी
...
कैसे बनाऊँ अपना स्वर्ण महल
उसने चोंच में तिनका लेकर
जाती हुई चिड़िया दिखा दी
..
मैंने कहा अब विश्राम करना चाहती हूँ
उसने तरु की एक कोमल
पत्ती बिछा दी

जीवन आख्याति में कवयित्री जीवन की यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर पल भर ठहरती है और आगे बढ़ जाती है

दुनिया में आया तो जननी प्यारी मिली
वात्सल्यता की देवी
जीवन संचारी मिली
बाल्यावस्था में खेल खिलौने
पुस्तक और मित्रों की यारी मिली
किशोरावस्था में भ्रमित, जिज्ञासु  मन
और प्रश्नों की श्रंखला
विस्मयकारी मिली
युवावस्था में दिल की
संगत न्यारी मिली
..
प्रौढावस्था में कुछ परिपक्व अनुभव
कुछ संचयन आबंटन की हकदारी मिली
..
अतिम चरण में
मौत जीवन में भारी मिली

राजेश कुमारी जी कि इन कविताओं को पढ़ते हुए उनके सामाजिक सराकोरों से दो चार होते हुए और जीवन यात्रा का आकलन करते हुए एक सुखद अहसास हुआ, आशा है सभी सुधी पाठक जन भी इनका रसास्वादन करेंगे.


  
   


मंगलवार, मई 8

मैं तुम और प्रेम


मैं तुम और प्रेम

मै, तुम और प्रेम एक ही शै के तीन नाम हैं
जिनसे पनपी हैं सारी सभ्यताएं
अतीत से भविष्य तक
बांधता है एक ही सूत्र भीतर से जिन्हें
ऊपर-ऊपर से ही है भेद
लेकिन तौला जाता है उपरी आवरण देख
चमकता हुआ पत्थर उठा लिया जाता है
हीरा समझ कर
जल्दी में हैं जो लोग
देख नहीं पाते वह आधार
जो जोड़ता है
एक महीन पारदर्शी फिल्म सा
जो है भी और नहीं भी
जिसमें लिपटा है ब्रह्मांड
जो होकर भी अव्यक्त है
इसी प्रकृति की ऊर्जा के पुजारी हैं
मैं, तुम और प्रेम.....


शुक्रवार, दिसंबर 30

शुभ हो नया वर्ष




शुभ हो नया वर्ष

चलो एक बार फिर
करें स्वागत नव वर्ष का !
यूँ तो सृष्टि हर क्षण नयी है
उपजती है, मिटती है
उमडती है, गिरती है
बनती है पल-पल अपनी गरिमा में
कुछ और ही...
नहीं था हिमालय का उत्तंग शिखर लाखों वर्ष पूर्व
आज जहाँ है मरुथल, बहती थी जलधार वहाँ
वहाँ आज कंटक हैं...जहाँ फूलों की घाटियाँ थीं कभी  
रूप और आकार बदलते हैं
बदलती हैं चेहरे की रेखाएं भी
नेताओं के भविष्य भी, देशों की सीमाएं भी....

एक वर्ष में भी बदल जाता है बहुत कुछ
चलो एक बार फिर
कुछ वायदें करें खुद से
अपनी सम्भावनाओं को तलाशें
बीज जो मचल रहा है भीतर
फूल बनने को
उसे उचित खाद और जल से सींचें
सुनें दिल की ज्यादा
जब दिमाग कहे शॉर्टकट अपनाने को
दे दिलाकर कुछ अपना काम निकलवाने को....

चलो एक बार फिर
करें यकीन अच्छाई पर
कुछ पेड़ लगाएं
धरती को हरा-भरा छोड़ जाने के लिये
और मत व्यक्त करें
जब चुनाव आएँ...
चलो नववर्ष का करें स्वागत...