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मंगलवार, नवंबर 30

हम खुद में कितने रहते हैं


हम खुद में कितने रहते हैं 


गौर किया है कभी ठहर कर 

इत-उत क्यों डोला करते हैं 


कभी यहाँ का कभी वहाँ का 

हाल व चाल लिया करते हैं 


बस खुद का ही रस्ता भूले 

दुनिया भर घूमा करते हैं 


सब इस पर निर्भर करता है 

हम खुद में कितने रहते हैं 


मन में हैं पूरे के पूरे 

कमियों का रोना रोते हैं 


अपनी हालत जानें खुद से 

राज यही भूला करते हैं 


खो जाता है मन आ खुद में 

हम ही रूप धरा करते हैं 


मंगलवार, जनवरी 14

है सारा विस्तार एक से



है सारा विस्तार एक से

सूरज बनकर दमक रहा है बना चन्द्रिका चमक रहा है, झर झर झरती जल धार बना बन सुवास मृदु गमक रहा है ! हरियाली बन बिखराता सुख भाव रूप में मौन व गरिमा कहाँ अलग धरती अम्बर से है सारा विस्तार एक से ! जल का स्वाद, अन्नका पोषण वह ही लपट आग की नीली, उससे ही जग का आकर्षण वही ज्वाला बनी है पीली ! वह ही भाव, विचार, ज्ञान है वह ही लघु, सबसे प्रधान है, उससे कोई कहाँ विलग है जिससे है वह कहाँ अलग है ! जननी है वह सब जीवों की उससे रूप सभी को मिलता, वही पराशक्ति भी अजर वह नाम जहाँ से पैदा होता ! खुद को खुद की जगे कामना ऐसी माया वह ही रचती, जग का पहिया रहे डोलता ऐसा कुछ आयोजन करती ! थामे हुए नजर है कोई आसपास ही सदा डोलती, ग्रह, नक्षत्र सभी की शोभा एक उसी का राज खोलती !



शनिवार, नवंबर 30

छिपा अरूप रूप के पीछे

छिपा अरूप रूप के पीछे


इश्क में जो भी डूबा यारा
बहती भीतर अमृत धारा,
जब-जब उस से लगन लगाई
जल जाती हर झूठी कारा !


जब कण-कण में वही बसा है
नयनों से फिर कौन पुकारे,
स्मित उसका पट छूकर आयी
भाव पंख से जिसे सँवारे !


हल्का-हल्का सा स्पंदन है
किस अनदेखे का नर्तन है,
पलक झपकते निमिष मात्र में
महाकाल का शुभ वंदन है !


छिपा अरूप रूप के पीछे
उसे निहारा किन नयनों से,
सुख की गागर सदा लुटाये
व्यक्त हुआ ना वह बयनों से  !


रूप, रंग, रस स्वाद अनूठा
कौन सुनाये अपनी गाथा,
कोई नहीं अलावा उसके
खुला रहस्य उसने बांचा !

मंगलवार, जून 11

मन से कुछ बातें



मन से कुछ बातें


कितने दिन और यहाँ घूमोगे, गाओगे
भटके हो बार-बार कब तक झुठलाओगे ?
 एक न एक.. दिन घर तो आओगे !

स्वाद लिए, रूप देखे, सुर, सुवास में रमे
कदम थके भले यहाँ, पल भर भी नहीं थमे
कितने ठिकानों से दूर किये जाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

कौन सुने बात किसकी बंद कर्ण खुले मुख
तोड़ दिया किसी ने यह शीशाए जिगर फिर
गीत यही आखिर कब तक दोहराओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !

भूत जान पर लगा है भय भी अनजान का
जब तब सताएगा ही सरस ख्वाब मान का
पहरे कहाँ तब सोच पर  लगा पाओगे ?
एक न एक दिन.. घर तो आओगे !


बुधवार, अक्टूबर 7

हम तो घर में रहते हैं


हम तो घर में रहते हैं

जग की बहुत देख ली हलचल
कहीं न पहुँचे कहते हैं,
पाया है विश्राम कहे मन
हम तो घर में रहते हैं !

जिसके पीछे दौड़ रहा था
छाया ही थी एक छलावा,
घर जाकर यह राज खुला
माया है जग एक भुलावा !

कदम थमे तब दरस हुआ
प्रीत के अश्रु बहते हैं,
रूप के पीछे छिपा अरूप
उससे मिलकर रहते हैं !

मंगलवार, मार्च 24

हे !

हे !

तू ही जाने तेरी महिमा
मौन हुआ मन झलक ही पाकर,
छायी मधु ऋतु खोया पतझड़
अब न लौटेगा जो जाकर !

रुनझुन गुनगुन गूँजे प्रतिपल
बरस रही ज्योत्स्ना अविरत,
पग-पग ज्योति कलश बिखेरे
स्रोत अखंड अमी का प्रतिपल !

द्वार खुला है एक अनोखा
पार है जिसके मन्दिर तेरा,
हिमशिखरों सा चमचम चमके
आठ पहर ही रहे सवेरा !

टिमटिम दिपदिप उड्गण हो ज्यों
श्वेत पुष्प झर झर झरते हैं,
रूप हजारों तू धरता है
सौन्दर्य, रंग भरते हैं !

राज न कोई जाने तेरा
तुझ संग मिलना न हो पाए,
देख तुझे 'मैं' खो जाता है
'तू' ही बस तुझसे मिल पाए !


शुक्रवार, मार्च 13

पास आकर दूर जाये

पास आकर दूर जाये

तितलियाँ जो उड़ रही हैं
गंध पीतीं रस समोती,
रंगे जिसने पर सजीले
उस अलख के गीत गातीं !

मौन ही होता मुखर
संग पवन जब डोलती हैं,
नृत्य झलके हर अदा में
शान से पर तोलती हैं !

हैं अनोखी कलाकृतियाँ
चमचमाते रंग धारे,
सूर्य रश्मि छू रही ज्यों
चित्र कोई कर उकेरे !

रंग बदलें धूप-छाहीं
पारदर्शी पंख भी हैं,
जाने किसकी राह देखें
लाल बुंदकी से सजी हैं !

पंख रक्तिम हैं किसी के
पीतवर्णी धारियां भी,
श्याम, नीले पर किसी के
श्वेत बूँदें तारिका सी !

हैं हजारों रूप सुंदर
रंग भी लाखों किसिम के,
बैंगनी, नीली, सजीली
पर गुलाबी हैं किसी के !

श्वेत वर्णी भी सुहाए
पास आकर दूर जाये,
बैठ जाती पर समेटे
पुष्प का आसन बनाये !

शोख रंगीं छटा जिनकी
ज्यों रंगोली हो सजी,
रंग घुले हैं इस अदा से
होड़ हो ज्यों पुष्प से ही !

विविध हैं आकार अनुपम
लघु काया है लुभाती,
मन उड़े जाता उन्हीं संग
प्रीत उनसे बंध लजाती !


कला उसकी राज खोले
मूक है जो कुछ न बोले,
तितलियों, फूलों के चर्चे
उपवनों में गीत घोलें !

आँख जैसे हो परों पर
देखती हों सब नजारे,
घूमती पुष्पों के ऊपर
नजर उनकी ज्यों उतारें !


बुधवार, दिसंबर 19

अब जब




अब जब

अब जब कुछ करने को नहीं है
तो समय की अनंत राशि बिखरी हुई है
चारों ओर...

अब जब कहीं जाना नहीं है
दूर तक सीधी सुकोमल राह बिछी है
फूलों भरी...

अब जब सुनने को कुछ शेष नहीं रह गया
उपवन गुंजाता है भीतर अहर्निश कोई रागिनी
गूंजते हैं मद्धिम मद्धिम पायल के स्वर...

अब जब देखने की चाह नहीं है  
नित नए रंगों में रूप दीखता है
लुभाती है इठलाती हुई प्रकृति....

अब जब कि कुछ पाना नहीं है
सारा अस्तित्व ही पनाह लेता दीखता है भीतर
आँख मूंदते ही...

अब जब कि कुछ जानना नहीं है
वह आतुर है अपने रहस्य खोलने को....

गुरुवार, मई 3

आया दांतों पसीना


आया दांतों पसीना


कल रात उन से मुलाकात हुई
कुछ बोध मिला कुछ बात हुई

अगर तन है मकान
तो रूप उसकी बैठक
सजा संवार रखते हैं बड़े जतन से जिसे
लगभग सभी इंसान..

आँखें झरोखे, दिल इबादतघर
अब सब घरों में तो होता नहीं
बड़ा.... सा.. पूजा घर
बहुत हुआ तो किसी आले में
या चलता है स्टोर घर...

फेफड़े, भीतरी खिड़कियाँ
धुएं से धुंधलाए जिनपर लगे शीशे
किसी किसी के.....  

पेट पाक शाला, जहाँ
बड़वाग्नि में पकता भोजन
वहाँ होती है
जिद्दी चिकनाई और ढेर सारा मसाला....

दर्द था दांत में सो हुआ यह मिलन   
न होता तो कहाँ उठती यह चिलमन
नजर भी नहीं आते दांत, जिनसे
जीवन भर सेवा हैं लेते
शुक्रिया एक दफा भी नहीं देते..

गर्म पेय या भोजन लिया मुख में
 सिहर जाता होगा इनेमल तब
इसकी परवाह करते हैं कब
झट से कोई कठोर वस्तु दबा ली
अनजाने उनकी जड़ हिला दी
मीठी चाय बहुत भाती  
पर शामत बेचारे दांतों की आती

ठंडागर्म लगने पर भी टाल ही जाते
अनसुनी कर देते हर गुहार
जब तक दर्द हद से न बढ़ जाये
और दम न तोड़ने लगे कोई दांत
दंत चिकित्सालय तक कदम नहीं बढ़ाये   
चिकित्सक झांकता जब भीतर
मुस्कुराते हुए सर उठाता है
उसे रोग के साथ
सुनहरा भविष्य जो नजर आता है...

दातों से यूँ हुईं कुछ बात
कट गयी सोते जागते रात...