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बुधवार, मई 15

उस सन्नाटे के पीछे तब

उस सन्नाटे के पीछे तब


जहाँ शब्द साथ न देते हों 

जब सूना-सूना अंबर हो, 

घन का कतरा भी नहीं एक   

जो ढक लेता है सूरज को !


उस ख़ालीपन को जो भर दें  

भावों का भी अभाव लगता, 

उस सन्नाटे के पीछे तब

जाकर उस अनाम से मिलना !


पीता कोई भर-भर प्याला

जीवन की मदिरा है बँटती,

खड़ा उजाला चंद कदम पर

हो रात अँधेरी कितनी भी !