ढाई आखर प्रेम के
‘प’ से परस स्नेह भरा
आश्वस्त करता हुआ
भीतर की सारी शुभता को
प्रियतम में भरता हुआ
परख ले जो अंतर की अकुलाहट
पनपा दे अनायास ही मुस्कुराहट !
‘र’ से रमा हो कण-कण में अस्तित्व के
रमणीय हो उसके अपनेपन की आभा !
‘ए’ से एक की ही याद दिलाता
सारा द्वैत इक पल में मिट जाता !
‘म’ से माँ की तरह समेट ले विशाल हृदय में
मधुर बन पूर्ण करे हर अभाव प्रियस्पद का !
ऐसा निश्चछल प्रेम ही हर मन की आस है
जिसकी स्मृति ही भर देती जीवन में उजास है !
‘प’ से जब पाना ही होता है लक्ष्य
‘र’ बन जाता है रौरव
एषणायें जगाता
ममता की बेड़ियों में जकड़ा
प्रेम मुक्त नहीं करता
पीड़ा के फूल ही अंचल में भरता !
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गुरुवार, नवंबर 19
ढाई आखर प्रेम के
शनिवार, जुलाई 18
शुक्रवार, अप्रैल 11
एक मौन सन्नाटा भीतर
एक मौन सन्नाटा भीतर
सहज कभी था आज जटिल है
कृत्य कुंद जब भाव सुप्त है,
एक मौन सन्नाटा भीतर
हुई शब्दों की धार लुप्त है !
नहीं लालसा, नहीं कामना
जीवन की ज्यों गति थमी है,
इक आधार मिला नौका को
बीच धार पतवार गुमी है !
अब न कहीं जाना राही को
घर से दूर निकल आया है,
ममता के पर कटे मुक्ति का
राग हृदय को अब भाया है !
न कोई संदेश भेजना
न ही कोई छाप छोड़ना,
लक्ष्य सभी पीछे छूटे हैं
नहीं राम को धनुष तोड़ना !
जीवन, जब जैसा मिल जाये
दोनों बाँह पसारे लेता,
जहाँ जरूरत जो भी दिखती
अंतर को खाली कर देता !
गुरुवार, नवंबर 14
बाल मजदूर
आज भी देश के कई हिस्सों में बच्चे अभिशप्त हैं खतरनाक रोजगार में काम
करने के लिए, बाल दिवस पर जहाँ सक्षम बच्चे खुशियाँ मना रहे हैं, उन के लिए इस दिन
का कोई महत्व नहीं है.
बाल मजदूर
वह बूढ़े होते इंसान की तरह भयभीत है
नहीं जाना तितलियों के पीछे भागना
रूठना, मचलना याद नहीं
याद हैं वे दंश, वे तीखे अनुभव
जिनकी मार सही है रोज हर रोज
जब नैतिकता शरमायी होगी
चीखा होगा बचपन
रोया होगा फूल कोई
पंछी भी चुपचाप उड़ गया होगा
पर न देखा माँ की ममता ने
बाप के साये ने
वह पल जिसमें किसी की मृत्यु हुई थी
जगत चलता रहा अलग-थलग
घिसटता रहा कोई अपनी ही ऊँगली थामे
चल पड़ा एकाकी सूनी राह पर
ठोकर खायी
नहीं देखा किसी ने, न पूछा कुछ
वह बूढ़ा हो गया असमय
दुनिया वंचित रही एक यौवन से
बिखरे मोतियों को न जोड़ा किसी ने
न बनाया हार, न पहना गले में !
मंगलवार, नवंबर 5
भाई दूज पर शुभ स्नेह सहित
भाई दूज पर शुभ स्नेह सहित
कुछ यादें, कुछ बातें मनहर
याद दिलाये आज का पल हर
उच्च भाल पर तिलक सज रहा
नयनों में छाया वह मंजर !
‘भाई’ शब्द में घुली मिठास
हर पल बहना को है आस,
सदा सुखी हो संग भाभी के
बढ़ा करे श्रद्धा-विश्वास !
एक वाटिका के पुष्प हैं
संग-संग झेले ऋतु आघात,
संग-संग पायी ममता प्रीति
साझे थे कितने प्रभात !
बिन बोले संवाद है घटता
बचपन के साथी जो ठहरे,
जीवन क्रम में भले दूर हों
सूत्र बंधे हैं भीतर गहरे !
शुभ दिन दीपपर्व का अंतिम
इक संदेश बांटता जाता,
ज्योति प्रेम की कभी बुझे न
कण-कण सृष्टि का यह गाता !
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