अंतहीन उसका है आंगन
मौन से इक उत्सव उपजता
नई धुनों का सृजन हो रहा,
मन में प्रीत पुष्प जन्मा है
सन्नाटे से गीत उठ रहा !
उस असीम से नेह लगा तो
सहज प्रेम जग हेतु जगा है,
अंतहीन उसका है आंगन
भीतर का आकाश सजा है !
बिन ताल एक कमल खिला है
हंसा लहर-लहर जा खेले,
बिन सूरज उजियाला होता
अंतर का जब दीप जला ले !
शून्य गगन में हृदय डोलता
मधुमय अनहद नित राग सुने,
अमिय बरसता भरता जाता
अंतर घट को जो रिक्त करे !
घर में ही जब ढूँढा उसको
वहीं कहीं छुप कर बैठा था
नजर उठा के देखा भर था
हुआ मस्त जो मन रूठा था !
आदि, अंत से रहित हो रहा
आठ पहर है सुधा सरसती,
दूर हुई जब दौड़ जगत की
निकट लगी नित कृपा बरसती !
.jpeg)