चेतना हर हल बनेगी
आग
भीतर जो जलाती
पथ
प्रदर्शक भी वही है,
अश्रु
बनकर जल बहा जो
मनस
शोधक भी वही है !
शोक
पाहन सा चुभे जो
पाँव
की सीढ़ी बनेगा,
घन
विपत्ति का अंधेरा
एक
दिन सूरज बनेगा !
गर
कोई संघर्ष न हो
सुवर्ण
न कुंदन बनेगा,
बिना
मंथन सिंधु से भी
क्योंकर
मधु अमृत झरेगा !
तप
रही जो आज माटी
नीर
कल धारण करेगी,
प्रश्न
बनकर जो खड़ी है
चेतना
हर हल बनेगी !
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