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बुधवार, नवंबर 4

चेतना हर हल बनेगी

चेतना हर हल बनेगी

आग भीतर जो जलाती

पथ प्रदर्शक भी वही है,

अश्रु बनकर जल बहा जो

मनस शोधक भी वही है !

 

शोक पाहन सा चुभे जो 

पाँव की सीढ़ी  बनेगा,

घन विपत्ति का अंधेरा

एक दिन सूरज बनेगा !

 

गर कोई संघर्ष न हो

सुवर्ण न कुंदन बनेगा,

बिना मंथन सिंधु से भी

क्योंकर मधु अमृत झरेगा !

 

तप रही जो आज माटी

नीर कल धारण करेगी,

प्रश्न बनकर जो खड़ी है

चेतना हर हल बनेगी ! 

 

 

 


सोमवार, जुलाई 21

झुका समपर्ण में जब मस्तक


झुका समपर्ण में जब मस्तक


सैकत पर लहरें सागर की
छोड़ चलीं ज्यों सीपी, शंख
उर के इस खाली दर्पण पर
स्मृतियों की बह गयी तरंग !

सेतु बनाया उन सुधियों को
सृजन किया इक भावालोक,
आवाहन कर प्राण प्रिय का
रचा महावर मिटाया शोक !

सुषमा अतुलित सुरति सुभग है
 सिंहावलोकन भी आवश्यक,
तब तब प्राण हुए आलोड़ित
झुका समपर्ण में जब मस्तक !