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गुरुवार, मई 25

है कोई अनुबंध अनकहा

है कोई अनुबंध अनकहा

अंक लिए संपूर्ण  सृष्टि को 
वह असीम यूँ डोल रहा है,
ह्रदय गुहा का वासी भी है 
निज रहस्य को खोल रहा है ! 

अंतरैक्य जब भी घटता है 
सिंधु बिंदु में झर-झर जाता,
अम्बर सा जो ढाँपे जग को 
लघु उर में वह अजर समाता !

अक्षत, अगरु, अग्नि स्फुलिंग सी  
ज्योति अखंड बिखेरे भीतर,
अनंत, अचल , अमरत्व , अदम्य 
भरे आस्था, प्रीत निरंतर ! 

अनुकंपित कण-कण को करता 
है कोई अनुबंध अनकहा,
रहे अगोचर कहने भर को 
हस्ताक्षर हर कहीं दिख रहा ! 

स्वयं अनुरक्त दृष्टि डालता 
सहस भुजाओं वाला कहते,
अनुरागी अंतर को मथता 
प्रेमिल अश्रु यूँ नहीं बहते ! 

बुधवार, नवंबर 4

चेतना हर हल बनेगी

चेतना हर हल बनेगी

आग भीतर जो जलाती

पथ प्रदर्शक भी वही है,

अश्रु बनकर जल बहा जो

मनस शोधक भी वही है !

 

शोक पाहन सा चुभे जो 

पाँव की सीढ़ी  बनेगा,

घन विपत्ति का अंधेरा

एक दिन सूरज बनेगा !

 

गर कोई संघर्ष न हो

सुवर्ण न कुंदन बनेगा,

बिना मंथन सिंधु से भी

क्योंकर मधु अमृत झरेगा !

 

तप रही जो आज माटी

नीर कल धारण करेगी,

प्रश्न बनकर जो खड़ी है

चेतना हर हल बनेगी ! 

 

 

 


शुक्रवार, मार्च 6

चाह-अचाह


चाह-अचाह

हर चाह रिझाती है पहले 
फिर वही भगाती है 
मन-सागर में लहरों की 
एक पंक्ति जगाती है 
मन के सूने पनघट पर ही 
उसके आने की सम्भावना है 
भीड़ में मिलन असंभव है 
जब तक अटका है एक तार भी चाहत का 
उसकी बांसुरी की धुन अनसुनी रह जाती है 
जो बज रही है अहर्निश 
उसकी याद में बहाया हर अश्रु 
पोंछ डालता है मन के रस्तों पर 
पड़ी धूल के कणों को 
जो हर चाह लिए आती है अपने संग 
अनन्त प्रतीक्षा करने का साहस है जिसमें 
भीतर लौट गयी मन की उस धारा(राधा)को ही 
कृष्ण मिला करते हैं 
कान जब कुछ और सुनना न चाहें 
पलकें मुंद जाएँ निहार  अपना ही रूप 
रिक्त हुआ ठहर जाये 
ऐसे ही किसी क्षण में 
उसकी झलक आये ! 

शुक्रवार, जनवरी 12

कदमों में भी राहें हैं



कदमों में भी राहें हैं

अभी जुम्बिश भुजाओं में
कदगों में भी राहें हैं,
अभी है हौसला दिल में
गंतव्य पर निगाहें हैं !

परम  दिन-रात रचता है
जगती नित नूतन सजती,
नींदों में सपन भेजे
जागरण में धुनें बजतीं !

चलें, हम थाम लें दामन
इसी पल को अमर कर लें,
छुपा है गर्भ में जिसके
उसे देखें, नजर भर लें !

अभी झरने दें शब्दों को
प्रस्तर क्यों बनें पथ में,
सृजन का स्रोत है अविचल
बहाने दें सहज जग में !

अभी मुखरित तराने हों
विरह के भी प्रणय के भी,
किसी के अश्रु थम जाएँ
वेदना  से विजय के भी !

नहीं रुकना नहीं थमना
अभी तो दूर जाना है,
जिसे अपना बनाया है
उसे जग में लुटाना है !


मंगलवार, दिसंबर 13

राग प्रीत का जो साधा था

राग प्रीत का जो साधा था  

है विशाल, अनन्त, अनूठा 
कैसे लघु मन उसको जाने 
शिखर चाहता भय खाई से 
सीमा स्वयं की, यह न माने !

खुल जायेगा हर वह बंधन 
सुख की आस में जो बाँधा  था,
छलक-छलक वह बह जाएगा 
राग प्रीत का जो साधा था !

युगों-युगों से गूँज रहा स्वर 
अंतरिक्ष न बाँच  सका  है,
गा - गा कर खग वृन्द थके न 
क्यों उर में संदेह  जगा है !

अश्रु बने हैं पाती जिसके 
कतरा- कतरा बहे सभी दुःख,
एक अलस मद मस्त खुमारी 
बून्द-बून्द कर रिसता है सुख !

सदा निहारे नयन मौन हो 
श्वासों में गंध बन बसता,
साया कोई संग चल रहा 
 परस पवन का  दे-दे  हँसता !






गुरुवार, मई 14

मृत्यु और जीवन

मृत्यु और जीवन


मौत एक पल में छीन लेती है कितना कुछ
माथे का सिंदूर हाथों की चूड़ियाँ
मन का चैन और अधरों की हँसी
पत्नी होने का सौभाग्य ही नहीं छीनती मौत
एक स्त्री से उसके कितने छोटे-छोटे सुख भी
पिता का आश्रय ही नहीं उठता सिर से
पुत्र की निश्चिंतता, उसका भरोसा भी
अश्रु बहते हैं निरंतर… ऑंखें सूज जाती हैं
रुदन थमता नहीं विधवा का
रह-रह कर याद आती है कोई बात
और कचोट उठती है सीने में
रोते-रोते चौंक जाती है
कह उठती है, मुझे साथ ले चलो
पर कोई जवाब नहीं आता
कभी नहीं आया,
उस पार गया कोई भी लौट कर नहीं आया
क्या है मृत्यु ?
जो छीन लेती है जीवन का रस
अपनों का, भर जाती है ऐसी उदासी
जो कभी खत्म होगी इसका विश्वास नहीं होता
मर सकता है कोई भी.. कभी भी.. किसी भी क्षण
तो क्यों न सामना करें इस प्रश्न का
क्यों न रहें तैयार हर पल.. सामना करने मौत का...
मौत जो जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है
जिसकी नींव पर ही जीवन की भीत टिकाई है
जीवन के पीछे ही छुपी है मौत
करती रहती है इंतजार उस पल का
जब शांत हो जायेगा सांसों का खेल
और झपट लेगी वह हलचल जीवन की
मुर्दा हो जायेगा यह शरीर
पर भीतर जो जान थी उसे
छू भी नहीं पायेगी मौत
कौन जानता है उसका होना
वही जो उतरा है भीतर जीते जी
जिसने चखा है मृत्यु का स्वाद जीते जी
जिसने पहचान की है घर के मालिक से !