मृत्यु और जीवन
मौत एक पल में छीन लेती है कितना कुछ
माथे का सिंदूर हाथों की चूड़ियाँ
मन का चैन और अधरों की हँसी
पत्नी होने का सौभाग्य ही नहीं छीनती मौत
एक स्त्री से उसके कितने छोटे-छोटे सुख भी
पिता का आश्रय ही नहीं उठता सिर से
पुत्र की निश्चिंतता, उसका भरोसा भी
अश्रु बहते हैं निरंतर… ऑंखें सूज जाती हैं
रुदन थमता नहीं विधवा का
रह-रह कर याद आती है कोई बात
और कचोट उठती है सीने में
रोते-रोते चौंक जाती है
कह उठती है, मुझे साथ ले चलो
पर कोई जवाब नहीं आता
कभी नहीं आया,
उस पार गया कोई भी लौट कर नहीं आया
क्या है मृत्यु ?
जो छीन लेती है जीवन का रस
अपनों का, भर जाती है ऐसी उदासी
जो कभी खत्म होगी इसका विश्वास नहीं होता
मर सकता है कोई भी.. कभी भी.. किसी भी क्षण
तो क्यों न सामना करें इस प्रश्न का
क्यों न रहें तैयार हर पल.. सामना करने मौत का...
मौत जो जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है
जिसकी नींव पर ही जीवन की भीत टिकाई है
जीवन के पीछे ही छुपी है मौत
करती रहती है इंतजार उस पल का
जब शांत हो जायेगा सांसों का खेल
और झपट लेगी वह हलचल जीवन की
मुर्दा हो जायेगा यह शरीर
पर भीतर जो जान थी उसे
छू भी नहीं पायेगी मौत
कौन जानता है उसका होना
वही जो उतरा है भीतर जीते जी
जिसने चखा है मृत्यु का स्वाद जीते जी
जिसने पहचान की है घर के मालिक से !