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मंगलवार, जुलाई 28

गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ

गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाएँ 



गुरु का हर इक वचन अनूठा 

अंधकार मन का हर लेता, 

गुरु का दर्शन कितना पावन 

शिष्य सहज ख़ुद को पा लेता !


गुरु हर जगह ईश को देखे 

नित अनेक में एक देखता, 

उस परम के सान्निध्य में रह 

पल-पल वह आनंदित रहता !


परम सुरभि से महक रहा जग

उसी की आभा से प्रकाशित 

अद्भुत महिमा वह ही जाने 

शिष्य ओर भी सदा प्रवाहित 


जग को इक आभास समझता

स्वप्न निशि का, भोर का तारा 

ना जाने कितने युग बीते 

चलता आता सदा पसारा !


 साक्षी है वह हर इक युग का 

गुरु अनंत शक्ति से जुड़ा है, 

उसे भी निज रूप में ढाले 

जो भी उसकी ओर मुड़ा है !


सोमवार, जुलाई 3

सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु

सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु


एक बूँद में सागर भर दे 

जो अनंत को हमें थमा दे,

नाम खुमारी में तर कर दे 

घूँट-घूँट में अमिय पिला दे !


जो बंदे को खुदा बनाता, 

उर में शीतल स्थान दिला दे, 

द्वैत भावना मिटा हृदय से  

पल में अपना आप मिला दे !


आनन से प्रकाश बिखेरता 

अनुकम्पा बरबस  छलकाए, 

पल में राज खोल दे सारे

जीवन में जागरण जगाये !


जाने कौन देश का वासी, 

कहता दुनिया बदली जाए, 

सूक्ष्म लहर ज्यों भरी प्रेम से, 

रह-रह अपने निकट बुलाए !


सत्यं, शिवं, सुन्दरं सदगुरु, 

या फिर लीला उस ईश्वर की, 

आँखों ही आँखों में बोले, 

लगन लगा दे परमेश्वर की !


स्वयं जागा जगाने आता 

धर्म सहजता का बतलाये, 

पावनी दृष्टि एक डालकर, 

सेवा भाव परम भर जाये  !


गुरु पूर्णिमा पर्व अलबेला 

मिलना सूक्ष्म अदृश्य भाव का,

ख़ुद  से भी जो निकट बसा है , 

पा जाना उस निज स्वभाव का !


बुधवार, जुलाई 13

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता


सदगुरु दोनों हाथ लुटाता

खुद से बढ़कर कुछ भी जग में

पाने योग्य नहीं है, कहता,

उसी एक को पहले पालो

सदगुरु दोनों हाथ लुटाता !

 

जग में होकर नहीं जगत में

सोये जागे वह तो रब में,

उसके भीतर ज्योति जली है

देखे वह सबके अंतर में !

 

भीतर का संगीत जगाता

खोई सी निज याद दिलाता,

जन्मों का जो सफर चल रहा

उसकी मंजिल पर ले जाता !

लूट मची है राम नाम की

निशदिन उसकी हाट सजी है,

झोली भर-भर लायें हम घर

उसको कोई कमी नहीं  है !


ऐसा परम स्नेही न दूजा

अनुपम उसका द्वार खुला है,

बिगड़ी जन्मों की संवारें 

सुंदर अवसर आज मिला है ! 


गुरु पूर्णिमा पर हार्दिक शुभकामनाओं सहित


रविवार, जुलाई 5

गुरू प्राकट्य सूर्य समान

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान

गुरु की गाथा कही न जाये
शब्दों में सामर्थ्य कहाँ है,
पावन ज्योति, विमल चांदनी 
बिखरी उसके चरण जहाँ हैं !

गुरू  प्राकट्य सूर्य समान
अंधकार अंतर का मिटाए,
मनहर चाँद पूर्णिमा का है 
सौम्य भाव हृदय में जगाए !

सिर पर हाथ धरे जिसके वह
जन्मों का फल पल में पाता,
एक वचन भी अपना ले जो
जीने का सम्बल पा जाता  !

महिमा उसकी अति अपार है
बिन पूछे ही उत्तर देता,
सारे प्रश्न कहीं खो जाते
अन्तर्यामी सद्गुरु होता !

दूर रहें या निकट गुरू के
काल-देश से है अतीत वह,
क्षण भर में ही मिलन घट गया
गूंज रहा जो पुण्य गीत वह !

पावन हिम शिखरों सा लगता
शक्ति अटल आनंद स्रोत है,
नाद गूंजता या कण-कण में
सदा प्रदीप्त अखंड ज्योत है !

वही शब्द है अर्थ भी वही
भाव जगाए दूसरा कौन,
अपनी महिमा खुद ही जाने
वाणी हो जाती स्वयं मौन !

निर्झर कल-कल बहता है ज्यों
गुरू से सहज झरे है प्रीत,
डाली से सुवास ज्यों फैले
उससे उगता मधुर संगीत !

धरती सम वह धारे भीतर
ज्ञान मोती प्रेम भंडारे,
बहे अनिल सा कोने-कोने
सारे जग को पल में तारे  !

रविवार, जुलाई 9

गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


युगों-युगों से राह दिखाते
उर-अंतर का तमस मिटाते,
ज्योति शिखा सम सदा प्रज्ज्वलित
सीमाओं में नहीं समाते !

प्रेम, ज्ञान, सुख पुंज शांति के
सुमन खिलाते परा भक्ति के
बिना भेद दिल से अपनाया
बंधन तोड़कर आसक्ति के !

विश्व बना परिवार तुम्हारा
सदा साथ रह बने सहारा
हो अनंत अनंत से मिलकर
सागर भी तुम तुम्हीं किनारा !

अपना जान तुम्हें जो भजता
शांति, ज्ञान से दामन भरता,
बाहर जो सुख ढूँढ़ रहा था
खुद के भीतर ही पा जाता !

जीवन मर्म, भेद समझाया
तुमने अपना आप दिखाया,
दुःख, पीड़ा आते-जाते हैं
सत्य शाश्वत ज्ञान बरसाया !

तुम क्या हो बस तुम्हीं जानते
निरख अदा हम वारी जाते,
जो आत्म निर्दोष है भीतर
उसकी आहट पा खिल जाते !

गुरू पूर्णिमा साँझ दिव्य है
महिमा गुरू की नित भव्य है,
नतमस्तक हो नमन करें हम
चरण धूलि गुरू की सेव्य है !